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Tuesday, January 16, 2018

पर्व संक्रान्ति



मीठी गजक
चटपटे मंगौड़े
तिल के लड्डू

लैया की पट्टी
मूंगफली की पट्टी
जाड़ों की मेवा

 मीठी रेवड़ी  
बाजरे की टिकिया
खोये के लड्डू

पोंगल भात
बाजरे की खिचड़ी
रस की खीर  

गुड़ की चाय
पकौड़े औ’ चटनी
मीठी गंडेरी

मनायें पर्व 
उड़ायें गगन में 
प्यारी पतंग 

  सूर्य की पूजा 
अन्न वस्त्र का दान
पर्व संक्रांति




साधना वैद 

Sunday, January 14, 2018

मैं पतंग



यह पतंग भी ना 
हू ब हू मेरे जैसी है !
पहली पहली बार उड़ाने की कोशिश में
वैसे ही बार बार गिर जाती है
जैसे अपने शैशव में
चलना सीखने के प्रक्रिया में
मैं बार बार गिर जाया करती थी !
बार बार दूर जाकर
हवा में खूब ऊँचे उछाल कर
फिर से उडाई जाती है
ठीक वैसे ही जैसे मुझे
बार बार सम्हाला जाता
और फिर चलाया जाता !
और अंतत: यह भी उड़ चली  
वैसे ही जैसे एक दिन
मुझे चलना आ गया !
आसमान की बाकी पतंगों के साथ
पेंच लड़ाने के लिए
पतंग की डोर में
काँच लगा हुआ माँझा
बिलकुल उसी तरह जोड़ा जाता
जैसे भविष्य की सारी स्पर्धाओं में
अव्वल आने के लिए माँ
मेरे जीवन की डोर में
व्यावहारिकता और संस्कारों का
माँझा बाँध दिया करती थी !
हवाओं का साथ पा जैसे
पतंग पलक झपकते ही
आसमान से बातें करने लगती
मैं भी युवा होते ही
अपने आसमान में अपने
संगी साथियों के साथ खूब
ऊँची उड़ने लगी !
सबके साथ सुख दुःख बाँटते
हँसते खिलखिलाते
दूर आसमान में उड़ना
खूब मन को भाने लगा !

कई साथी साथ रहे देर तक
कईयों के रास्ते बदल गए !
कई वक्त के साथ बिछड़ते गए
जिनकी डोर कटती गयी !
हवाओं के पंखों पर सवार
मेरी पतंग अभी भी गगन में
उड़ती जा रही है !
और कब तक उड़ पायेगी
नहीं जानती !
माँझा मज़बूत है या किस्मत
कौन जाने !
लेकिन एक दिन इस डोर का
कटना भी तय है
यह बिलकुल निश्चित है !


साधना वैद





Friday, January 12, 2018

दीप ले आओ



नन्हा सा दीप 
मिटाए जगत का 
अंधेरा घना 

छाँटनी होगी 
ज्ञानालोक के लिए 
मन की धुंध 

गहरा हुआ 
मन का अवसाद 
घुप्प अंधेरा 

जगमगा दो 
मन का कोना-कोना 
दीप ले आओ 

माटी का तन 
कोमल सी वर्तिका 
थोड़ा सा तेल 

देखो तो ज़रा 
जलते ही भगाया 
दूर अंधेरा 

फैला उजाला
निश्चित हुए लक्ष्य  
भागे संशय 

उमंगा मन 
पथ हुआ प्रशस्त 
मंजिल पास 

मन में हुआ 
साहस का संचार 
बढ़ा विश्वास 

नन्हे से दीप 
स्वीकार करो तुम 
मेरा प्रणाम 


साधना वैद 

Sunday, January 7, 2018

नमन तुम्हें मैया गंगे



गिरिराज तुम्हारे आनन को 
छूती हैं रवि रश्मियाँ प्रथम 
सहला कर धीरे से तुमको 
करती हैं तुम्हारा अभिनन्दन 
उनकी इस स्नेहिल उष्मा से 
बहती है नित जो जलधारा 
वह धरती पर नीचे आकर 
करती है जन जन को पावन !



साधना वैद

Thursday, January 4, 2018

ओ करुणाकर




शोभित गगन के ललाट पर 
ओ करुणाकर भुवन भास्कर,
स्वर्णिम प्रकाश से तुम 
उदित हो जाओ 
जीवन में मेरे 
और आलोकित कर दो 
निमिष मात्र में 
मेरा यह तिमिरमय संसार,
जगमगा दो 
मेरे जीवन का 
हर कोना-कोना 
कि चुन सकूँ मैं 
राह के हर कंकड़ को,
हटा सकूँ पथ की 
हर बाधा को 
ताकि सुगम्य होकर 
प्रशस्त हो जाये 
मंज़िल तक का हर मार्ग !



साधना वैद

Friday, December 29, 2017

ये रिश्ते



हल्की सी ठेस
तोड़ जाती पल में
काँच से रिश्ते


कटु वचन 
छुईमुई से सच्चे 
शर्मिन्दा रिश्ते 


  गुस्से की आँधी  
टहनी से झरते
फूलों से रिश्ते 


बातों के शोले
अपमान की आग
झुलसे रिश्ते



चीरती बातें
मखमल से रिश्ते
काँटों से लोग


हुए एकाकी
जो सँवारे न रिश्ते
लगाए रोग


निर्मम धूप
चुरा कर ले गयी
रिश्तों की गंध


व्यर्थ हो गये
कागज़ के फूलों से
रिश्ते निर्गंध  


पूरा होने को
तरसते ही रहे
अधूरे रिश्ते


डाल से टूटे
जीवन सलिला में
बहते रिश्ते



साधना वैद






Tuesday, December 26, 2017

वह सर्दी की रात थी


वह सर्दी की रात थी
कड़कड़ाती ठण्ड थी
घना कोहरा था
बुझा बुझा सा अलाव था
सीली लकड़ियों से फैला
धुआँ ही धुआँ था चहुँ ओर
और थीं कडुआती आँखें !

घर से दूर
परिवार से दूर
अपने गाँव से दूर
उसे याद आ रही थीं
माँ के हाथ की बनी
चूल्हे से उतरी
गरम गरम रोटियाँ
बैंगन का भरता
और सिल बट्टे पर पिसी
मिर्च और लहसुन की
सुर्ख लाल चटनी !

इन नेमतों से दूर
बुझे अलाव के सामने
भूख से कुलबुलाती आँतों को
कस के घुटने से दबा
सर्द ज़मीन पर
पतली सी चादर से यथासाध्य
अपने तन को लपेटे
काँप रहा है वो
किस सुनहरे भविष्य की आस में
यह तो शायद वह
खुद भी नहीं जानता !

कहीं दूर से गाने की
आवाज़ आ रही है
“आगे भी जाने न तू
पीछे भी जाने न तू
जो भी है बस यही एक पल है”
उसका मन सहसा
बगावत कर उठता है
अगर वर्तमान का
यही एक पल सब कुछ है
तो नहीं चाहिए उसे यह
कँपकँपाती ठंडी रात
यह बर्फ सी सर्द ज़मीन
यह सीली लकड़ियों के धुँए से
कड़ुआती आँखें
यह बुझा अलाव और
गर्म चाय की
एक प्याली के लिए
तरसती जिह्वा !

एक निश्चय उसकी
इस उदासी को पल भर में
दूर कर जाता है 
उसे गाँव वापिस जाना है
कोई भी भौतिक लालसा
उसकी माँ से
उसके घर परिवार से
उसके गाँव से 
बढ़ कर हो ही नहीं सकती !

उसे जाना होगा
वापिस अपने घर
अपनों के बीच
अपनों के लिए
और खुद अपने भी लिए
और फिर इसके बाद
इस हाड़ कँपाती ठण्ड में भी
उसे बहुत गहरी नींद आई
जैसे एक नन्हा बालक
सो जाता है अपनी
माँ के आँचल में 
शांत बेसुध !
  


साधना वैद