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Saturday, December 9, 2017

बातों वाली गली – मेरी नज़र से



ये लीजिये ! इस ‘बातों वाली गली’ में एक बार जो घुस जाए उसका निकलना क्या आसान होता है ! इसकी उसकी न जाने किस-किस की, यहाँ की वहाँ की न जाने कहाँ-कहाँ की, इधर की उधर की न जाने किधर-किधर की बस बातें ही बातें ! और इतनी सारी बातों में हमारा तो मन ऐसा रमा कि किसी और बात की फिर सुध बुध ही नहीं रही ! आप समझ तो गए ना मैं किस ‘बातों वाली गली’ की बात कर रही हूँ ! जी यह है हमारी हरदिल अजीज़ बहुत प्यारी ब्लगर वन्दना अवस्थी दुबे जी की किताब ‘बातों वाली गली’ जिसमें उनकी चुनिन्दा एक से बढ़ कर एक २० कहानियाँ संगृहीत हैं ! सारी कहानियाँ एकदम चुस्त दुरुस्त ! मन पर गहरा प्रभाव छोड़तीं और चेतना को झकझोर कर बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करतीं !

इन कहानियों को पढ़ कर इस बात का बड़ी शिद्दत से एहसास होता है कि नारी मन की गहराइयों को नाप लेने की वन्दना जी में अद्भुत क्षमता है ! यूँ तो सारी ही कहानियाँ बहुत बढ़िया हैं लेकिन कुछ कहानियों में नारी मन की अंतर्वेदना का वन्दना जी ने जिस सूक्ष्मता के साथ चित्रण किया है वह देखते ही बनता है ! इन कहानियों को पढ़ते-पढ़ते कई बार अचंभित हुई कि अरे मेरी तो कभी वन्दना जी से बात ही नहीं हुई फिर इस घटना के बारे में इन्हें कैसे पता चल गया  और इतने सटीक तरीके से इन्होंने इसे कैसे लिख दिया ! क्या यह भी संयोग है कि स्वयं पर बीती हुई अनुभूत बातें ठीक उसी प्रकार औरों के साथ भी बीती हों ? चित्रण इतना सजीव और सशक्त कि जैसे चलचित्र से चल रहे उस घटनाक्रम के हम स्वयं एक प्रत्यक्षदर्शी हों ! लेखिका की यह एक बहुत बड़ी सफलता है कि पाठक कहानियों के चरित्रों के साथ गहन तादात्म्य अनुभव करने लगते हैं ! भाषा और शैली इतनी सहज और प्रांजल जैसे किसी मैदानी नदी का एकदम शांत, निर्द्वन्द्व, निर्बाध प्रवाह !

नारी को कमतर आँकने की रूढ़िवादी पुरुष मानसिकता पर करारा प्रहार करती कहानियाँ ‘सब जानती है शैव्या’ और ‘प्रिया की डायरी’ बहुत सुन्दर बन पडी हैं ! कुछ कहानियाँ जो मन के बहुत करीब लगीं उनके नाम अवश्य लूँगी ! ‘अहसास’, ‘विरुद्ध’ और ‘बड़ी हो गयी हैं ममता जी’ मुझे विशेष रूप से बहुत अच्छी लगीं ! ‘दस्तक के बाद’, ‘नीरा जाग गयी है’, ‘बड़ी बाई साहेब’ और ‘डेरा उखड़ने से पहले’ कहानियों में हम भी स्त्री की हृदय की विषम वीथियों में जैसे वन्दना जी के हमराह बन जाते हैं ! ‘हवा उद्दंड है’, ‘बातों वाली गली’ और ‘आस पास बिखरे लोग’ वास्तव में इतनी यथार्थवादी कहानियाँ हैं कि ज़रा इधर उधर गर्दन घुमा कर देख लेने भर से ही इन कहानियों के पात्र सशरीर हमारे सामने आ खड़े होते हैं !

‘बातों वाली गली’ कहानी संग्रह की हर कहानी हमें एक नए अनुभव से तो परिचित कराती ही है हमारी ज्ञानेन्द्रियों को नए स्वाद का रसास्वादन भी कराती है !

पुस्तक नि:संदेह रूप से संग्रहणीय है ! इतने सुन्दर संकलन के लिए वन्दना जी को बहुत-बहुत बधाई ! वे इसी तरह स्तरीय लेखन में निरत रहें और हमें इसी प्रकार अनमोल अद्वितीय कहानियाँ पढ़ने को मिलती रहें यही हमारी शुभकामना है ! आपकी अगली पुस्तक की प्रतीक्षा रहेगी वन्दना जी ! हार्दिक अभिनन्दन !




साधना वैद 

Tuesday, December 5, 2017

A thing of beauty is a joy for ever and for everyone.



मीडिया वालों की बातें कभी भरपूर मनोरंजन करती हैं तो कभी कभी तीव्र झुँझलाहट से भी भर देती हैं ! शशि कपूर साहेब की प्रशंसा में कल से बिना कॉमा फुल स्टॉप के सारे चैनल वाले कशीदाकारी में लगे हुए हैं ! लगना भी चाहिए ! वे नि:संदेह रूप से हरदिल अजीज़ कलाकार थे और अपने जीवन में उन्होंने दर्शकों का भरपूर प्यार, इज्ज़त और शोहरत कमाई ! जितने अच्छे वे कलाकार थे उतने ही अच्छे इंसान भी थे और एक निहायत ही खूबसूरत और शानदार व्यक्तित्व के स्वामी थे ! उनके चाहने वालों में स्त्री और पुरुष सभी शामिल थे ! लेकिन हमारे खोजी पत्रकार न जाने कहाँ से आँकड़े जुटा लाते हैं कि उन पर हज़ारों लड़कियाँ मरती थीं ! बात अगर किसी हीरो की हो जैसे देवानंद, राज कपूर, राजेश खन्ना, ओम पुरी, विनोद खन्ना, शशि कपूर तो पत्रकारों की स्क्रिप्ट में उन पर मरने वाले प्रशंसकों में महिलाओं की संख्या कई गुना अधिक हो जाती है और यही बात जब किसी हीरोइन की हो जैसे मधुबाला, नूतन, मीना कुमारी, दिव्या भारती, स्मिता पाटिल तो यहाँ अपनी प्रिय अभिनेत्री पर मरने वाले प्रशंसकों में महिलाओं का स्थान पुरुष ले लेते हैं ! अभी तक यह रहस्य समझ में नहीं आया कि इतने सटीक आँकड़े इन्हें मिल कहाँ से जाते हैं !

अंग्रेज़ी में एक कहावत है, A thing of beauty is a joy for ever. मैं इस वाक्य में थोड़ी सा इज़ाफा और करना चाहती हूँ, A thing of beauty is a joy for ever and for everyone. जो वस्तु अनमोल है, अनुपम है, प्रशंसनीय है वह हर इंसान को समान रूप से एक सा सुख देती है फिर चाहे वह स्त्री हो या पुरुष ! राज कपूर, देवानंद, राजेश खन्ना, विनोद खन्ना के प्रशंसक क्या पुरुष कम थे ? ना जाने कितने लोग उन्हीं की तरह रहने की, उन्हीं की स्टाइल के सूट, बूट, कोट, पेंट, चश्मे, टोपी पहनने की और उन्हीं की अदा से बोलने की कोशिश किया करते थे ! महिलायें तो सिर्फ प्रशंसा भरी नज़रों से ही देखती होंगी लेकिन पुरुष तो स्वयं को पूरी तरह से उन्हीं के अवतार में ढालने की कोशिश किया करते थे ! उसी तरह अभिनेत्रियों की खूबसूरती के जितने दीवाने पुरुष होते हैं महिलायें भी उनसे कम दीवानी नहीं होतीं ! आशा पारिख, साधना की हेयर स्टाइल, रेखा की तरह साड़ी पहनने का अंदाज़, करीना, करिश्मा की मेक अप टिप्स, प्रियंका, ऐश्वर्या, दीपिका और विद्द्या बालन की लुक्स की दीवानी स्त्रियाँ अधिक हैं और स्वयं को उन्हीं के अनुरूप बनाने की भरपूर कोशिश किया करती हैं ! बाज़ारों में ड्रेसेज भी महिलाओं को वही लुभाती हैं जिनके बारे में सेल्समेन बता देते हैं कि फलां फिल्म में दीपिका ने या प्रयंका ने ऐसी ही ड्रेस पहनी थी ! क्या किसी अभिनेता या अभिनेत्री की सफलता को आँकने का एक यही पैमाना होता है कि अभिनेता पर कितनी लड़कियाँ या अभिनेत्री पर कितने युवक प्राण न्यौछावर करने के लिए तत्पर हैं !

ज़रा सोचिये अमिताभ बच्चन को फिल्म की शूटिंग के दौरान जब गंभीर चोट लगी थी तब उनके जीवन की सलामती के लिए क्या सिर्फ महिला प्रशंसकों ने ही दुआ की थी ? सारा हिन्दुस्तान तब प्रार्थनाघर में तब्दील हो गया लगता था और हर इंसान के हाथ उनके जीवन की रक्षा की दुआ माँगने के लिए ऊपर उठे हुए थे ! कलाकार की कला और उसका आकर्षक व्यक्तित्व सबको समान रूप से लुभाता है इसलिए पत्रकार किसी भी कलाकार की प्रशंसा करते समय इस प्रकार की उक्तियों से बचें तो अच्छा होगा !

साधना वैद 

Saturday, December 2, 2017

दूषित हवा



कितना भी चाहे वह बचना
कितना भी चाहे मुँह फेरना  
गाहे बगाहे रोज़ ही उसकी  
मुलाक़ात हो जाती है,
उस सबसे जिससे वह  
पूरी शिद्दत से दूर बहुत दूर
रहना चाहती है  
लेकिन लाख कोशिश करने पर भी
बचने की कोई और सूरत
निकाल नहीं पाती है !
बचना चाहती है वह
उस कड़वाहट से
जो इन दिनों तुम्हारी वाणी का
आभूषण बन गयी है,
और जिसकी कर्णकटु खनक
उसकी बर्दाश्त के बाहर हो गयी है !  
उस नफरत से
जो तुम्हारे छोटे से दिल की
बहुत थोड़ी सी जगह में   
समा न सकने की वजह से
अक्सर ही बाहर छलक जाती है,
और घर में सबके
सुखमय संसार को
पल भर में ही
विषमय कर जाती है !
उस तल्खी से
जिसे इन दिनों शायद
तुमने अपनी ढाल बना लिया है,
और उस कवच की आड़ में
तानों उलाहनों के तीक्ष्ण बाण चला
सबके कोमल दिलों को
तीरंदाजी का पटल बना लिया है !
उस अजनबियत से
जिसे ओढ़ कर तुम अपनी
बदसूरती को सायास
ढकने का प्रयास करते हो,
और अपनी हर बेढंगी चाल से
परत दर परत खोल-खोल कर  
खुद को ही उघाड़ा करते हो !
कितना मुश्किल हो गया है
इतनी दूषित हवा में साँस लेना  
ताज़ी हवा के एक झोंके की
सख्त दरकार है कि
दम घुटने से
कुछ तो राहत मिले
कुछ तो साँसें ठिकाने से आयें
कुछ तो जीने की चाहत खिले !

साधना वैद

Sunday, November 26, 2017

अनमना मन




अंश मेरे,
हर प्रखर मौसम की
निर्मम मार से
जिनको बचाया
फड़फड़ा कर पंख
उड़ कर दूर जाने को
स्वयं आतुर हुए से,
मोह के सतरंग धागे
थाम रखा था
जतन से जिनको मैंने
उँगलियों से छूट कर
खुलते हुए से !
रिक्त है मन
रिक्त मधुबन 
रिक्त है घर
रिक्त जीवन !
घट चली है एक रुत 
फूलों भरी सी
खुशबुओं से बहलना
अब आ गया है,
बंद कर दो गीत सब
सुख से भरे अब
हमको फिर से
मौन रहना
भा गया है !
फिर वही पतझड़ का मौसम
फिर वही वीरान मंज़र
दर्द के इस गाँव का
हर ठौर पहचाना हुआ सा
हैं सुपरिचित रास्ते सब 
और सब खामोश गलियाँ
साथ मेरे चल रहा है दुःख  
हम साया हुआ सा !

साधना वैद







Friday, November 17, 2017

सन्नाटा



दर्पण के सामने खड़ी हूँ
लेकिन नहीं जानती
मुझे अपना ही प्रतिबिम्ब
क्यों नहीं दिखाई देता ,
कितने जाने अनजाने लोगों की
भीड़ है सम्मुख
लेकिन नहीं जानती
वही एक चिर परिचित चेहरा
क्यों नहीं दिखाई देता ,
कितनी सारी आवाजें हरदम
गूँजती हैं इर्द गिर्द
लेकिन नहीं जानती
खामोशी की वही एक
धीमी सी फुसफुसाहट
क्यों नहीं सुनाई देती ,
कितने सारे मंज़र
बिखरे पड़े हैं चारों ओर
लेकिन नहीं जानती
मन की तपन को जो
शांत कर दे वही एक मंज़र
क्यों नहीं दिखाई देता !
नहीं जानती  
यह हमारे ही वजूद के 
मिट जाने की वजह से है
या दुनिया की इस भीड़ में
तुम्हारे खो जाने के कारण
लेकिन यह सच है कि
ना अब दर्पण मुस्कुराता है
कि मन को शक्ति मिले
ना कोई चेहरा स्नेह विगलित  
मुस्कान से आश्वस्त करता है
कि सारी पीड़ा तिरोहित हो जाये ,
ना खामोशी की धीमी-धीमी
आवाजें सुनाई देती हैं
कि हृदय में जलतरंग बज उठे ,
ना आत्मा को तृप्त करने वाला
कोई मंज़र ही दिखाई देता है
कि मन का पतझड़ वसंत बन जाये !
अब सिर्फ सन्नाटा ही सन्नाटा है
भीतर भी और बाहर भी !

साधना वैद

Saturday, November 4, 2017

व्यामोह




यह कैसी नीरसता है
जैसे अब किसी भी बात में
ज़रा सी भी रूचि नहीं रही
पहले छोटी-छोटी चीज़ें भी
कितना खुश कर जाती थीं
मोगरे या सेवंती के फूलों का
छोटा सा गजरा,
काँच के मोतियों की सादी सी माला,
एक मीठा सा गीत,
एक छोटी सी कहानी,
कल कल झर झर बहता झरना,
गगन में उन्मुक्त उमड़ते घुमड़ते
बेफिक्र काले ऊदे बादल,
खूब ऊँचाई पर आसमान में लहराते
दिल के आकार के लाल नीले गुब्बारे,
पेंच लड़ाती रंग बिरंगी पतंगें,
झुण्ड बना कर दूर क्षितिज तक
उड़ान भरते चहचहाते पंछी !
नज़रें इन्हें देखते थकती न थीं
और मन कभी भूले से भी
मुरझाता न था !
अब जैसे सब कुछ
बेमानी सा हो गया है
न कोई भाव जागता है
न कोई खुशी ही मिलती है
ना ही कुछ याद आता है
न ही मन इनमें रमता है !
यह विरक्ति है या व्यामोह
कौन बताये !

साधना वैद



Sunday, October 29, 2017

गुरु - गुरुदेव - गुरुघंटाल



ढोंगी बाबाओं के आश्रमों का मकड़जाल

इस लेख का मकसद उन सच्चे गुरुओं और उनके द्वारा संचालित आश्रमों का अपमान करना बिलकुल नहीं है जो अपनी निस्वार्थ सेवा से जनता का भला कर रहे हैं ! प्रयत्न यह है कि उन कारणों को समझा जाए जिनकी वजह से इतनी बड़ी संख्या में लोग अनेक कपटी बाबाओं के जाल में फँसते चले जाते हैं !

मनुष्य समाज का एक हिस्सा बन कर रहता है ! रोटी, कपड़ा, मकान आदि अपनी बुनियादी आवश्यकताओं के लिए वह कोई न कोई व्यवसाय चुन लेता है ! लेकिन इनके अलावा जीवन में अनेकों ऐसी समस्याएँ या परिस्थितियाँ पैदा हो जाती हैं जिनके समाधान एवं निवारण के लिए उसे किसी के सलाह मशवरे या मार्गदर्शन की आवश्यकता भी होती है जो अक्सर अपने करीबियों या मित्रों से कभी तो मिल जाती है और कभी नहीं भी मिल पाती है ! हम सभी किसी न किसी धर्म का अनुसरण करते हैं ! कुछ नास्तिक भी होते हैं लेकिन उनके बारे में फिर कभी बात करेंगे ! अपने देश में हिन्दुओं का प्रतिशत सबसे अधिक होने की वजह से गुरू भी संख्या में सबसे अधिक हिन्दुओं में ही है !

इन्ही गुरुओं में कुछ तो वास्तव में होते हैं सच्चे महात्मा एवं पथ प्रदर्शक और कुछ के चोले में छिपे रहते हैं गुरु घंटाल ! मनुष्य के रूप में छिपे हुए ऐसे आदमखोर भेड़िये जो अनेक प्रकार के हथकंडों को अपना कर लोगों को अपने जाल में फँसाने में कामयाब हो ही जाते हैं ! दरअसल इस मायाजाल का आरम्भ होता है प्रभावशाली व्यक्तित्व वाले और लुभावनी बातों से लोगों को सम्मोहित कर लेने की क्षमता रखने वाले ढोंगियों की सत्संग सभाओं से जो अक्सर शुरू तो होती हैं किसी पार्क के कोने या छोटे मोटे मंदिर के प्रांगण से लेकिन जब भीड़ बढ़ने लगती है तो इन धर्म सभाओं के लिए बड़े बड़े हॉल या पंडालों की व्यवस्था भी होने लगती है ! उनमें दान पात्र भी आ जाते हैं और धन भी जमा होने लगता है ! एक अच्छे व्यापारी की तरह इस धन का निवेश ये गुरुघंटाल बाबा लोग बड़ी चतुराई से करते हैं ! पहले सत्संग के बाद कुछ प्रसाद, फिर चार छ: महीने में एकाध बार किसी बड़े गुरु के नाम का भंडारा और फिर किसी अच्छी जगह पर, जो अक्सर किसी मंदिर की बगीची इत्यादि होती है, वहाँ पर नियमित भंडारों का आयोजन किया जाने लगता है ! देश की अधिकाँश जनता धर्म भीरू तो है ही साथ ही मनोरंजन की भी भूखी है ! ऊपर से जहाँ मुफ्त में प्रसाद के रूप में स्वादिष्ट भोजन भी मिले तो भक्त लोग तो सपरिवार आते ही हैं अपने मित्रों व सम्बन्धियों को भी साथ में ले आते हैं ! जनता का जमावड़ा बड़ा होता देख पोलीटिकल पार्टियाँ भी बहती गंगा में हाथ धोने के लिए उस गुरु घंटाल में रूचि लेने लगती हैं क्योंकि उनको इसमें अपने वोट बैंक की खुशबू आने लगती है ! नेताओं को देख उनके चमचे, सरकारी अफसर भी हाजिरी लगाने लगते हैं ! पुलिस का आयोजन और सुरक्षा का प्रबंध तो स्वाभाविक रूप से हो ही जाता है क्योंकि आखिर सरकार और पुलिस जनता की सुरक्षा के लिए ही तो बनी हैं ! भंडारे मेले का रूप ले लेते हैं !

अगला कदम है मुफ्त की सरकारी ज़मीन पर कब्ज़ा कर उसको आश्रम या डेरे का नाम दे देना ! इसके लिए सत्ताधारी राजनैतिक दल के नेता और उनके जी हजूरी करने वाले सरकारी अफसर खुद ही इशारा कर ऐसी जगह उपलब्ध करा देते हैं जहाँ पर मनमाना निर्माण कर धीरे धीरे उस आश्रम को एक भव्य रूप देकर गुरुघंटाल खुद उसके राजा बन जाते हैं ! वे मुकुट पहन सिंहासन पर बैठने लगते हैं और अपने लिए निजी सुरक्षा कर्मियों को नियुक्त कर स्वयं ही अपने को विभिन्न विशेषणों और उपाधियों से विभूषित कर एक सिद्ध महात्मा बन जाते हैं ! उनकी महिमा का यश फैलते ही श्रद्धालुओं की संख्या में अपार वृद्धि हो जाती है और आश्रमों की आमदनी बढ़ने लगती है !

दूर से आने वाले भक्तों को आकर्षित करने के लिए आश्रम में ही उनके रहने की व्यवस्था कर दी जाती है ! मनोरंजन के साधन बनाए जाते हैं जो देखने में तो धार्मिक लगते हैं लेकिन होते चकाचौंध वाले हैं ! कुछ ही समय में ये आश्रम पूरी तरह से व्यावसायिक होलीडे होम बन चुके होते हैं ! लाभ की अपार संभावनाएं देख व्यवसायी भी पैसा कमाने के लिए इनसे जुड़ने लगते हैं ! धूर्त ठग भी इस स्थान में अपना अच्छा भविष्य देख चेले बन कर आश्रम के सेवक बन जाते हैं और गुरु के साथ जुड़ जाते हैं ! ये धूर्त लोग गुरु को ठगी के नए-नए तरीके समझाने लगते हैं जो धर्म के नाम पर किये जा सकते हैं ! अब एक ही स्थान पर भोली भाली जनता और विकृत मनोवृत्ति वाले ठगों की सलाह पर चलने वाले गुरुघंटाल का “सत्संग” होने लगता है ! गुरू की कामयाबी को देख चकित जनता उसको भगवान् मानने में देर नहीं करती ! कुछ मूर्ख भक्त तो उसे पूरी तरह से और कुछ कम बुद्धि के लोग आधे मन से उसे ईश्वर के समकक्ष मानने लगते हैं ! कुछ लोग जो ऐसा नहीं मानते वो उस जगह को एक कम खर्च में समय व्यतीत करने का अच्छा मनोरंजक स्थल तो मान ही लेते हैं ! इस भीड़ भाड़ और आपाधापी में कुछ अति दुखी और अनेक कारणों से पीड़ित और टूटे हुए परिवार भी आ फँसते हैं और इन ठगों के जाल में अपने को पूरी तरह से समर्पित कर देते हैं ! आम तौर पर इस भीड़ में अपने हालात और समस्याओं से परेशान और दुखी महिलाओं की संख्या अधिक होती है जो इन गुरुघंटाल बाबाओं के पास उनके निदान के लिए आती हैं ! किसीका पति बीमार है तो किसीकी बेटी का विवाह नहीं हो रहा है, किसीका बेटा बेरोजगार है तो कोई गृह कलह की मारी हुई है, किसीका बच्चा मनोरोगी है तो किसीकी गृहस्थी में पराई स्त्री की दखलन्दाजी है ! गुरुघंटाल ऐसी महिलाओं की मन:स्थिति को ताड़ लेते हैं और फिर उनके समाधान बताने के लिए उन्हें पूरी तरह से अपने चंगुल में फँसा लेते हैं ! तरह तरह के व्रत उपवास, यज्ञ अनुष्ठान करने की सलाहें उन्हें देते हैं और फिर उन्हें निष्पादित करने के उचित एवं प्रभावी तरीके सिखाने के लिए आम सत्संग सभाओं के आगे पीछे अलग समय दे उन्हें बुलाया जाने लगता है ! धन की वर्षा, ऊपर से दूषित मनोवृत्ति के ठगों का प्रभाव और मूर्ख परिवारों का बिना शर्त समर्पण अनैतिकता और अय्याशी की फसल के उगने के लिए एक अच्छी ज़मीन तैयार कर देता है जिसके दुष्परिणामों का अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है और अब तो ये काण्ड सार्वजनिक हो ही गए हैं !

अपने अन्दर झाँक कर यदि हम देखें तो इस दूषित वातावरण को बनाने के लिए क्या हम खुद ही ज़िम्मेदार नहीं हैं ? हम खुद ही इन गुरु घंटालों को निर्मित करते हैं, उन्हें पालते पोसते हैं, उनकी पूजा कर उन्हें ‘भगवान्’ का दर्ज़ा देते हैं, उनकी सुख सुविधा संपन्न एवं ऐश्वर्यपूर्ण जीवन शैली को बनाए रखने के लिए स्वयं कंगाल होते चले जाते हैं लेकिन उफ़ तक नहीं करते और हम में से ही बहुत सारे ऐसे भी हैं जो सब कुछ जानते हुए भी केवल इसीलिये चुप रह जाते हैं कि उन्हें अपनी व अपने परिवार की सुरक्षा के लिए खतरे का आभास होता है क्योंकि ये तथाकथित ‘भग़वान’ यदि कुपित हो जायें तो अपने बागी भक्तों को गाजर मूली की तरह नेस्तनाबूद कर देने में भी पल भर की देर नहीं करते ! एक तरह से समाज के लिए ये सबसे बड़ा खतरा बन जाते हैं ! ये उन अपराधियों से भी अधिक खतरनाक हो जाते हैं जो पुलिस की मोस्ट वांटेड की लिस्ट में होते हैं ! उनके नाम और पहचान तो सार्वजनिक होती है तो स्वयं को पुलिस से बचाने और छुपाने का इंतजाम उन्हें खुद ही करना होता है लेकिन इन तथाकथित ‘भगवान्’ बने अपराधियों को तो पूरा सहयोग समर्थन और संरक्षण हम आप जैसे आम लोग ही दे रहे हैं और वह भी पूरे दम ख़म के साथ ! कोई हाथ लगा कर तो देख ले ‘भगवान्’ को जान देने के लिए हज़ारों की भीड़ खड़ी होती है !

तो मित्रों यही वक्त है अपनी आँखें खोलने का, अपनी अंतरात्मा को जगाने का और अपनी प्राथमिकताओं को तय करने का कि हमें किसका साथ देना है और किसके हाथ मजबूत करने हैं ! सोने के सिंहासनों पर बैठे सात सितारा होटलों से भी अधिक सुख सुविधाओं के साथ ऐश्वर्यपूर्ण जीवन बिताने वाले इन भोग विलासी ‘सन्यासी साधू संतों’ का या इनके हाथों छली जाने वाली और इनकी कुत्सित मनोवृत्तियों का शिकार होने वाली हमारी भोली भाली भक्त बिरादरी का ? निर्णय आपके हाथ में है !


साधना वैद