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Sunday, July 23, 2017

एक पिता की फ़रियाद



हमने भी जिया है जीवन ! मर्यादाओं के साथ ! मूल्यों के साथ ! सीमाओं में रह कर ! अनुशासन के साथ !

जीवन तुम भी जी रहे हो ! लेकिन अपनी शर्तों के साथ ! नितांत निरंकुश होकर ! बिना किसी दखलंदाजी के ! बिलकुल अपने तरीके से !

असहमति तब भी थी ! असंतोष तब भी था ! झुँझलाहट तब भी थी ! विरोध तब भी था ! हर नयी पीढ़ी का अपने से पुरानी पीढ़ी से कुछ न कुछ, कम या ज्यादह मतभेद स्वाभाविक है ! 
हर युग में होता है ! लेकिन हर युग में उसे व्यक्त करने के तरीके बदल जाते हैं !

तब असभ्यता नहीं थी ! उच्श्रन्खलता नहीं थी ! उद्दंडता नहीं थी और निर्लज्जता नहीं थी !

रिश्तों का सम्मान था ! छोटे बड़े का लिहाज़ था ! मर्यादा का मान था ! अनुशासन का ज्ञान था !

विरोध था लेकिन विद्रोह नहीं था ! असहमति थी लेकिन असभ्यता नहीं थी ! असंतोष था लेकिन जोड़ने और जुड़े रहने की भावना प्रबल थी ! गुस्से में यदि कभी मुँह खुल भी गया तो पश्चाताप भी था मानसिक अनुताप भी था ! झुकने से परहेज़ नहीं था ! माफी माँग लेने से कोई गुरेज़ नहीं था !

तुम्हारी छोटी छोटी भूलों और नादान शरारतों पर दूसरों के गुस्से से  
तुम्हें बचाने के लिए हम औरों से लड़ पड़ते थे ! अब औरों की
बड़ी बड़ी गलतियाँ और गुनाह छिपाने के लिए तुम हम से लड़ पड़ते हो !   

तुम्हारी हर छोटी से छोटी फरमाइश को पूरा करने के लिए मैंने लगभग हर रोज़ ओवरटाईम किया ! रोज़ रात को अपनी जेब खाली कर गिनता था कि तुम्हारे मुख की मुस्कान खरीदने के लिए अभी कितने रुपयों की ज़रुरत और है ! हिसाब तुम भी रोज़ लगाते हो कि आज दिन भर में मैंने चाय के कितने कप पिये और कितनी रोटियाँ अधिक बनानी पडीं ताकि गृहस्थी पर पड़े बोझ की चर्चा कर तुम मेरे मुख की मुस्कान छीन सको !

अब युग बदल गया है अब अपनी ही संतान अपने माता पिता से हिसाब माँगती है कि बचपन में उन्होंने अपने बच्चों के लिए क्या किया, कितना किया और जितना किया सिर्फ उतना ही क्यों किया ! माता पिता ने जो किया वह भी कैसे किया यह जानने की शायद उन्हें ज़रुरत ही नहीं !

लेकिन डंके की चोट पर दिन भर सबके सामने यह गाने और जतलाने में उन्हें कोई एतराज़ नहीं कि, भले ही महीने दो महीने ही सही, अपने वृद्ध, बीमार और असहाय माता पिता को ज़िंदा रखने की प्रक्रिया में उन्होंने कितना हाथ पैरों से काम किया और कितना धन व्यय किया !

जिन माता पिता ने जीवन भर संघर्ष कर अपना पेट काट अपनी हर इच्छा को मार बच्चों को सीने से लगा पैरों पर खड़ा कर दिया उनके वे ही दुलारे बच्चे उन्हें घर से बाहर का रास्ता दिखाने में तनिक भी देर नहीं लगाते !

यह कलयुग है भाई यहाँ दूसरों की आँखों के तिनके गिनने के सब अभ्यस्त हैं लेकिन अपनी ही आँखों के शहतीर हटाना या तो उन्हें आता नहीं या वे इसकी ज़रुरत ही नहीं समझते !   


साधना वैद  

Thursday, July 20, 2017

सुबह हुई





सुबह हुई 
हमसफ़र चाँद 
घर को चला


देखो तो ज़रा 
क्षितिज के किनारे 
कौन है आया


दानी आदित्य 
लुटा रहा प्रकाश 
सहस्त्र हाथों


रवि रश्मियाँ 
सहलाएं तन को 
पुलकी धरा


दिव्य रश्मियाँ 
उतरीं धरा पर 
साक्षी हैं वृक्ष


स्वागत करे 
भुवन भास्कर का 
मुग्ध वसुधा


मौन पर्वत 
झर झर झरने 
करे नमन


पग पखारें 
कल कल नदियाँ 
मुदित मन


करे प्रकृति 
सुन्दर सुवासित 
पुष्प अर्पित


लदे हुए हैं 
फलों से तरुवर 
भोग के लिए


मुखर हुई 
विहगों के गान में 
ईश वन्दना


नत मस्तक 
झुकी अभ्यर्थना में 
धरा सुन्दरी


आँखें तो खोलो 
धन्य करो नयन 
दिव्य दृश्य से


जागी संसृति 
मन में आस लिए 
भोर हो गयी



साधना वैद

Monday, July 17, 2017

कुण्डली हाइकू - अभिनव प्रयोग




हार गयी मैं
और कितने गूँथूँ
फूलों के हार

दिये जलाये
प्रसन्न हो प्रभु ने
दर्शन दिये

दीवान लिखे
अत्याचारी राजा का
क्रूर दीवान

सोया जो बोया
रह गया बापू का
नसीब सोया

माँग थी छोटी
भर दें पिया मेरी
मोती से माँग

जंग हो बंद
हथियारों में लगे
भले ही जंग

पानी पिला दूँ
नानी याद करा दूँ
उतारूँ पानी

पान कराये
षठ रस व्यंजन
खिलाया पान

आम जन का
सबसे प्रिय फल
रसीला आम

खोया सिरे से
मिठाई की मंडी में
विशुद्ध खोया

 पीली चुनरी
लगने लगी नीली
थोड़ी जो पी ली !

सोना है पाना
तो करो परिश्रम
त्याग दो सोना

जीना शान से
सफल हो चढ़ना
  यश का जीना  

संग दिल हैं
प्रियतम फिर भी
रहूँ मैं संग


साधना वैद



  

Thursday, July 13, 2017

उपकार तुम्हारा



धुँधली सी रोशनी है 
धीमी सी आहट है 
मन के क्षितिज पर 
कोई सूरज उदित होने को है !
कल्पना का पंछी 
उड़ान भरने को बेकल है 
हे मेरे आराध्य 
उसके डैनों में 
इतनी शक्ति भर देना कि 
अपने गंतव्य तक पहुँचने में
उसे कोई बाधा न आये 
और प्रात की इस बेला में 
उसका मन उल्लास से 
उत्साह से भर जाए ! 
उपकार होगा तुम्हारा !




साधना वैद

Tuesday, July 11, 2017

बोलो, करोगे मुझसे दोस्ती ?





ऐ चाँद 
निरभ्र गगन में 
जगत के सामने अपनी 
शक्ति और सामर्थ्य का तुम चाहे 
जितना भी प्रदर्शन कर लो 
अपनी सम्पूर्ण भव्यता,
अप्रतिम सौन्दर्य और 
पूरी आन बान शान के साथ
पूरे दम ख़म से चाहे 
जितना भी चमक लो 
मैं जानती हूँ कि आज तुम 
कितने एकाकी हो 
कितने विकल हो 
बिलकुल मेरी ही तरह !
मैं जानती हूँ कि 
तुम्हारे पास भी कोई नहीं है 
जिसके कंधे पर सर रख कर 
तुम दो अश्रु बहा लो 
जिसकी ममता भरी गोद में 
मुख छिपा तुम अपने सारे दुःख 
सारी चिंताएं भुला 
दो घड़ी विश्राम कर सको ! 
मुझसे दोस्ती करोगे ? 
अगर करना चाहते हो 
तो अपना सारा दंभ 
सारा अहम् वहीं छोड़ 
नीचे आ जाओ ! 
देख रहे हो न तुम 
सागर की उत्ताल तरंगे भी 
कैसे व्याकुल होकर 
बुलाती हैं तुम्हें !
वहाँ गगन में ही चढ़े रहोगे तो 
निश्चित रूप से तुम 
अकेले ही रह जाओगे 
नीचे आ जाओगे तो तुम्हें 
खूब सारे साथी मिल जायेंगे ! 
हम दुनिया वालों को 
सबके दुःख दर्द बांटना 
आता भी है और भाता भी है 
बस शर्त यही है कि तुम्हें भी 
हमारी तरह ही बनना होगा 
एक सर्व साधारण सा आम इंसान ! 
राजसी ठाठ बाट से चिपके रहोगे 
तो अकेले ही रह जाओगे ! 
अब फैसला तुम्हारा है !



साधना वैद

Sunday, July 9, 2017

नफ़रत की आँधी

                                                                              


कितने जतन से तुमसे जुड़ी सारी
मधुर स्मृतियों को गहरे अतीत की 
निर्जन वीथियों में घुस कर मैं सायास
बीन बटोर कर सहेज लाई थी !
जिनमें शामिल थीं तुम्हारी बेतरतीब
भोली भाली तोतली बातें, तुम्हारा गुस्सा,
तुम्हारी मासूम शरारतें, तुम्हारी जिदें,  
तुम्हारी ढेर सारी चुलबुली शैतानियाँ,
टूटे दाँतों वाली तुम्हारी निश्छल मुस्कान और 
अतुलनीय स्नेह से सिक्त कुछ भीगे पल !   
कितनी गर्वित थी मैं अपने इस
अनमोल खजाने पर !
रोज़ कितने मान से कितने प्यार से
दुलार लेती थी इन मधुर पलों को !
इनका मृदुल स्पर्श झुठला देता था
वर्तमान की उन सारी कड़वी अनुभूतियों को,
कटु वचनों के ज़हर बुझे नश्तरों से
छलनी कर देने वाले तीखे प्रहारों को,  
और हृदय के उन सारे कसकते ज़ख्मों को
जो आज तक मेरे अंतर में रिसते रहे हैं !
तुमसे जुड़ी मधुर स्मृतियों से भरी
यह छोटा सी मंजूषा मेरे जीवन की
सबसे अनमोल निधि है,
सबसे अनुपम उपलब्धि है !
स्वर्गिक सुख की इस अनुभूति को मैं
आँखें मूँदे आत्मसात ही तो कर रही थी
जब अचानक ही नफ़रत भरे शब्दों की
तेज़ आँधी आई और उड़ा ले गयी
एक ही पल में मेरे उस अनमोल खजाने को
जिसको भली प्रकार से मैं
अभी सहेज भी न पाई थी !
सारी कोमल यादें. भीगे पल,
मीठी मधुर बातें, मृदुल स्पर्श
सब पल भर में ही न जाने कहाँ-कहाँ
इस चक्रवाती झंझा में उड़ने लगे हैं !  
मैं जी जान से अपनी समूची शक्ति लगा
उन्हें समेटने में लगी हुई हूँ कि
किसी तरह मेरे पास भी कुछ तो ऐसा
ठहर जाए जो उम्र के इस मुकाम पर
मेरे जीने का संबल बन जाए !
लेकिन क्षुद्र तिनके सी तितर बितर हो
उड़ती जातीं ये मधुर यादें मेरी आँखों से
प्रति पल ओझल होती जा रही हैं !
और मैं व्यथित, थकित, चकित सी
बिलकुल खाली हाथ खड़ी
यह सोच रही हूँ कि सच क्या था ?
अतीत का वह पावन नाता और
वो भूले बिसरे चंद मधुर पल  
या आज की यह मर्मान्तक
नफ़रत की आँधी ?


साधना वैद



Thursday, July 6, 2017

सूखा पेड़




वृद्ध होकर मैं धरा पर एक दिन गिर जाउँगा 
जानता हूँ मैं किसीके काम फिर ना आउँगा ! 

अब नहीं फलते रसीले आम मेरी शाख पर 
लग रहा बट्टा मेरी ऐश्वर्यशाली साख पर !

हैं नहीं पावन मुलायम पात वन्दनवार को 
पोंछने को हैं न पत्ते पथिक की श्रम धार को ! 

दे नहीं सकता हवा अब मैं किसी भी क्लांत को 
तनिक छाया दे न पाऊँ श्रांत से दिग्भ्रांत को ! 

संकुचित होते विहग भी बैठने में डाल पर 
पड़ न जाए काल की दृष्टि सुखी संसार पर ! 

है झुलाया जिनको वर्षों लोग वो डरने लगे 
टूट ना जाएँ मेरी सूखी भुजा कहने लगे ! 

किन्तु फिर भी हूँ खड़ा मैं आज भी अभिमान से 
हूँ अकिंचन आज पर जीवन जिया है शान से ! 

आज भी है हौसला और जोश भी कुछ कम नहीं 
दिया जो अब तक जगत को मान उसका कम नहीं !

जगत की अवहेलना का दंश चुभता है मुझे 
लिया जिसने ज़िंदगी भर दे सकेगा क्या मुझे ! 

जग मुखर सामर्थ्य पर अवसान पर वह मौन है 
वृद्ध दुर्बल जर्जरों का इस जगत में कौन है ! 

कोई समझे या न समझे है ‘उसे’ सबकी फिकर 
अनवरत संघर्ष पर मेरे ‘उसे’ होता फखर !

किया अभिनन्दन मेरा देकर मुझे सम्मान यह 
है मुझे स्वीकार मन और प्राण से वरदान यह ! 

मुकुट से जो दीखते हैं पात मेरे शीश पे 
किया है श्रृंगार प्रभु ने प्रेम से आशीष दे !



साधना वैद
चित्र - गूगल से साभार

Wednesday, July 5, 2017

ओ दाता मेरे




ओ दाता मेरे 
दरकार है मुझे
तेरी मेहर


जानता हूँ मैं 
रखता तू खबर 
शामो सहर


भुलाए दुःख 
तेरे ही कदमों में 
रख के सर


काहे का डर 
जब करता है तू
मेरी फिकर


जब भी हारा 
तूने दिया सहारा 
तेरा करम


हारीं मुश्किलें 
मिटी हैं मुसीबतें 
तेरा रहम


तू है सहारा 
निगहबाँ हमारा 
दीनो धरम


झोली पसारे
हैं दर पे तिहारे 
कैसी शरम


करें पुकार 
बख्श देना खताएं 
दे बस प्यार


नादाँ बड़े हैं 
भँवर की सफीना 
लगा दे पार


दिखा दे राह 
है उलझन बड़ी 
बन्दानवाज़


तू है करीम 
परवरदिगार 
सुन आवाज़



साधना वैद


Saturday, July 1, 2017

वापिसी




अभी तो लौटी हूँ !
मैं गयी तो थी निश्चित रूप से
यही सोच कर कि मैं
मंदिर में ही जा रही हूँ !
लेकिन वहाँ जो कुछ देखा
वह मुझे भ्रमित कर गया !
देवार्पण के लिए पूजा के थाल में
सुरभित सुगन्धित ताज़े फूलों की जगह
सूखी मुरझाई बासी पाँखुरियाँ थीं और
नैवेद्य के लिए मधुर फल और
सरस मिष्ठान्न के स्थान पर
विषैले फल और दूषित मिष्ठान्न
थाल में संजोया हुआ था !  
आरती के लिए सजाया गया वह दीप
शुद्ध घी का पावन दीप नहीं था !
उसे तैयार किया गया था
ऐसे भीषण ज्वलनशील पदार्थ से
जिसके जलते ही सर्वस्व जल कर
भस्म हो जाये और सबके हृदय
भयाक्रांत हो जायें !
प्रभु के माथे पर तिलक का
श्रृंगार करने के लिए वहाँ
चन्दन और कुमकुम का
शीतल लेप नहीं था वहाँ था
ऐसा लेप जो अंतिम समय में
तैयार करते समय शवों के ललाट पर
लगाया जाता है उनके
महाप्रस्थान से पहले !  
प्रार्थना के मंत्रों और श्लोकों में  
न विनय थी, न भक्ति,
न दीनता थी, न करुणा    
स्वरों में जो स्पष्ट रूप से
ध्वनित हो रही थी वह थी
किसी अघोरी तांत्रिक की
प्रेत साधना की ऐसी हुंकार,
ऐसी ललकार, ऐसी चुनौती
जो किसी का भी कलेजा चीर दे !
पूजा की ऐसी सारी विधियाँ  
किसी प्रेम, किसी सामंजस्य,  
किसी श्रद्धा, किसी समर्पण को
परिभाषित नहीं कर रही थीं  
वे तो परिभाषित कर रही थीं बस
ऐसे अलगाव को, ऐसी टूटन को,
ऐसे बिखराव, ऐसे विघटन को
जिसके बाद कुछ भी समेटना
नितांत असंभव हो जाए !
मन में इतनी अशांति और द्वन्द्व है  
कि सोच ही नहीं पा रही हूँ
मैं किसी मंदिर से लौटी हूँ या
फिर किसी श्मशान से !


साधना वैद

Tuesday, June 27, 2017

नई फ्रॉक





‘अम्मी चल ना बाहर ! देख कितनी सुन्दर, चमकीली, सोने चाँदी के तारों से कढ़ी फराकें ले के आया है फेरी वाला ! मुझे भी दिला दे न एक ! मामू की शादी में मैं भी नई फराक पहनूँगी !’ 
छ: बरस की करीना की आँखों में हसरत भी थी और चमक भी ! फेरी वाले की छड़ी पर टँगी रंग बिरंगी फ्रॉकें उसकी नज़रों के सामने से हट ही नहीं रही थीं ! बर्तन माँज कर हाथ धोती बानो की पीठ पर वह झूल गयी ! बानो का दिल मसोस उठा ! जानती थी खूब मोल भाव करने के बाद भी फ्रॉक अस्सी नब्बे से कम में न आयेगी और उसके डिब्बे में इस वक्त सिर्फ तीस रूपए पड़े हैं और घर गृहस्थी की तमाम ज़रूरतें मुँह बाये सामने खड़ी हैं ! लेकिन साथ ही यह भी जानती थी मना कर देगी तो करीना रो रोकर घर सर पर उठा लेगी ! फिर कुछ देर को झूठा ही सही थोड़ा शगल तो हो ही जाएगा जब वह अपनी ज़मीनी हकीकत से ऊपर उठ कर एक खरीदार बन जायेगी और फेरीवाला हर तरह से उसको खुश करने की कोशिश में जुट जाएगा ! दुपट्टे से हाथ पोंछती वह उठ खड़ी हुई, “जा नूरी को बुला ला ! देखें कैसी फराकें लाया है फेरी वाला !”
करीना की फरमाइश पर कोई ध्यान दिए बिना उसके दोनों भाई अजलू फजलू अभी तक मज़े से कंचों से खेल रहे थे ! बहन का रोना धोना जिद करना तो रोज़ का तमाशा है ! अभी कस के अम्मी की डाँट पड़ेगी तो या तो थोड़ी देर रिरिया कर सो जायेगी या झुग्गी के बाहर जाकर मोहल्ले की लड़कियों के संग इक्कड़ दुक्कड़ खेलने में रम जायेगी ! लेकिन अम्मी को खरीदारी के मूड में देख दोनों चौकन्ने हो गए ! यह क्या बात हुई ! करीना की फराक आयेगी तो उनको भी तो नयी कमीज़ चाहिए ! शादी तो उनके मामू की भी है ! दोनों चुप थे ! जानते थे कि ज़रा भी मुँह खोला तो अम्मी की आवाज़ बाद में निकलेगी और तमाचों से गाल पहले लाल हो जायेंगे ! दोनों भाई करीना के साथ बाहर निकल गए ! मन में उम्मीद भी थी कि हो सकता है फेरी वाले के पास कमीजें भी हों ! 
करीना दौड़ के नूरी को बुला लाई ! फेरी वाला झुग्गी के बाहर ही खड़ा आवाज़ लगा रहा था ! शहर की सीमा से लगी सैकड़ों झुग्गियों की इस बस्ती में हसरत भरी निगाहों से देखने वाले तो बहुत मानुस थे लेकिन खरीदार कोई नहीं था ! बानो और नूरी को आता देख फेरी वाले की आँखों में चमक आ गयी ! करीना जिस तरह सुन्दर फ्रॉक देख लालसा से भरी अन्दर भागी थी उसे उम्मीद हो गयी थी कि आज उसकी बोहनी ज़रूर हो जायेगी ! फेरी वाले की छड़ी में फ्रॉक्स के अलावा लहँगे, सलवार सूट, स्कर्ट टॉप और भी कई ड्रेसेज थीं ! बानो और नूरी का चेहरा भी उन्हें देख कर चमकने लगा ! मन कर रहा था अपने लिए भी एक दो सूट खरीद लें ! लेकिन पर्स की जमा पूँजी का ख्याल आते ही वह धरातल पर आ गयी ! चहरे पर रूखाई और आवाज़ में खुरदुराहट लाकर उसने फेरी वाले से कहा, 
“दिखाओ ज़रा कैसी फराके हैं ! हम भी तो देखें ! कैसी दी हैं ? ठीक दाम बताना !” 
“मैं कभी ग़लत बताता हूँ जो आज बताउँगा ! आप पसंद तो कर लो पहले ! दाम भी ठीक ही लगा दूँगा !” फेरी वाला पक्का सौदेबाज़ था ! बानो ने एक फ्रॉक निकलवाई ! क्रीम कलर की नेट का घेर था और काले रंग की जैकेट पर बड़े सुन्दर सुनहरी फूल कढ़े थे ! करीना के कन्धों से लगा साइज़ नापते हुए बानो ने पूछा. 
“यह कितने की है ?” पिंडलियों से भी लम्बी मैली कुचैली फ्रॉक से लगी वह खूबसूरत नयी फ्रॉक टाट में मखमल के पैबंद का आभास दे रही थी ! 
“यह है तो दो सौ रुपये की लेकिन सुबह का वक्त है ! बोहनी का टाइम है आप दस पंद्रह रुपये कम दे देना !” 
“पागल समझ रखा है क्या हमें !” बानो के चहरे पर एक पक्के खरीदार वाला रुआब आ गया ! फ्रॉक फेरी वाले को पकड़ाते हुए वह तुनक कर बोली, “ऐसा तो घटिया कपड़ा लगाया है कि एक ही धुलाई में छेद हो जायेंगे और कढाई भी कैसी खराब है ! इससे अच्छी तो हम घर में काढ लें ! उस पर ऐसे अनाप शनाप दाम बता रहे हो ! रहने दो तुम !” इस दमदार तक़रीर के बाद अपनी बात के समर्थन के लिए उसने नूरी की ओर देखा ! 
नूरी फेरी वाले की छड़ी से उतार-उतार कर अपने नाप का सूट देख रही थी ! 
“देखना बानो यह कैसा लग रहा है ?” फिर बानो की बात का समर्थन करते हुए उसकी ओर देखे बिना ही दूसरा सूट छडी से उतारते हुए बोली, “और क्या सही तो कह रही हो ! शहर की दूकान पर देखी थीं मैंने ! वहाँ ऐसी फराकें सौ सौ की मिल रही थीं !” बानो ने कस के उसका हाथ दबाया ! मन ही मन डर गयी थी कि अगर सौ रुपये में राजी हो गया तो कहाँ से लायेगी सौ रुपये वह ! नूरी की बात पलटते हुए वह बोली, 
“वह तो इनके मुकाबले में बहुत बढ़िया थीं ! इनका तो कपड़ा भी हल्का है ! रंग भी कच्चे लगते हैं ! एक ही धुलाई में उतर जायेंगे तो सारे पैसे बेकार हो जायेंगे ! रहने भैया तुम जाओ हमें नहीं लेना !”
“कैसी बात कर रही हो बहन ! सारे बाज़ार में ऐसा माल कहीं नहीं मिलेगा ! यही फराक बड़ी दूकान पर कोई चार सौ से कम में दे दे तो अल्ला कसम यह काम छोड़ दूँगा ! बोहनी का टाइम है इसलिए मैंने अपना नफ़ा भी छोड़ दिया है ! चलो न आपकी न मेरी आप एक सौ पचत्तर दे देना ! अब तो ठीक है ?”
बानो और नूरी के चहरे पर जीत की चमक दिखी ! अजलू फजलू का चेहरा आवेश से तमतमाने लगा ! फेरी वाले के पास केवल लड़कियों के कपडे थे ! लड़को के नहीं ! बानो ने दूसरी लाल फ्रॉक छड़ी से उतार कर करीना के कंधे से नापी ! अपने साइज़ से बहुत बड़ी मैली कुचैली सी एक नीली फ्रॉक बदन पर चढ़ाए हर वक्त घूमने की आदी करीना ने जब इतनी सुन्दर लाल फ्रॉक देखी तो उसकी आँखें उम्मीद और उल्लास से चमकने लगीं ! दोनों भाई रुआँसे हो गए ! 
“इसका क्या दाम है ?” बानो ने इशारों इशारों में नूरी की राय पूछी ! नूरी ने भी अपनी सहमति जताई ! 
“आप इसके एक सौ साठ दे देना ! है तो यह भी दो सौ की ही ! बस बात यह है कि जैसी आपकी बेटी वैसी मेरी बेटी ! इसीलिये आपको बिलकुल घर के दाम बता रहा हूँ !” 
“चलो रहने दो ! हमीं मिले हैं बेवकूफ बनाने के लिए क्या ! जितने दाम तुम बोल रहे हो इतने में तो ऐसी चार फराकें आ जायेंगी ! तुम जाओ ! हमको नहीं लेना है !” बानो ने फ्रॉक लौटाते हुए कहा ! लेकिन जो लफ्ज़ उसके मुँह से निकल रहे थे दिल उनका साथ नहीं दे रहा था ! छड़ी से उतार-उतार कर वह हर ड्रेस करीना के कन्धों से लगा कर नाप रही थी ! और करीना को इस वक्त जो खुशी मिल रही थी उसका अहसास इतने वर्षों में उसने पहले कभी नहीं किया था ! उसे भरोसा हो चला था कि इतने सारे कपड़ों में से कोई न कोई फराक तो अम्मी उसे दिला ही देगी ! 
“अरे कैसी बात कर रही हो बहन ! आप बताओ तो क्या दोगी ! बच्ची का दिल टूट जाएगा !” घाघ फेरी वाले ने अब करीना को हथियार बनाया, “बोल बेटा कौन सी फराक पसंद है तुझे लाल कि पीली ?”
करीना ने लाल फ्रॉक ले ली और सर में डालने लगी ! बानो ने झट से उसके हाथ से फ्रॉक खींचते हुए कहा, 
“मैं तो पचास से ज्यादह नहीं दूँगी ! तुम्हें देना है तो दे जाओ ! नहीं तो तुम्हारे जैसे बीसियों फेरी वाले रोज़ आते हैं !” मन ही मन वह घबरा भी रही थी कि फेरी वाला कहीं मान ही न जाए ! उसके डिब्बे में तो पचास रुपये भी नहीं हैं ! 
“अब ऐसे तो न बोलो बहन ! पचास रुपये में तो आजकल एक रूमाल भी नहीं आता है बड़े शहरों में ! बोहनी का टाइम है ! चलो पहली फराक घाटे में ही सही ! बहन सौ बात की एक बात है आख़िरी दाम लगा रहा हूँ आप एक सौ बीस रुपये दे देना !“ फेरी वाले ने फ्रॉक करीना के हाथों में पकडा दी ! 
करीना खुशी से उछल रही थी ! अजलू फजलू की आँखों में आँसू आ गए थे ! बानो और नूरी सकते में थीं ! खरीदारी का सारा जोश ठंडा हो गया था ! इस चक्रव्यूह से कैसे निकलें रास्ता नहीं मिल रहा था ! 
बानो जोर से चिल्लाई, “ अरे तुम तो सिर पर ही चढ़े जा रहे हो ! कह दिया ना पचास से ज्यादह नहीं देंगे ! देना हो तो दे दो नहीं तो अपना रास्ता नापो ! फालतू बखत नहीं है हमारे पास ! और भी बहुत सारे काम पड़े हैं करने को !” 
बानो के बदले सुर ने फेरी वाले को नाउम्मीद कर दिया ! करीना के हाथ से फ्रॉक ले उसने हैंगर में लगा छड़ी पर टाँग दी, “जब लेना ही नहीं था तो हमारा टाइम क्यों खोटी किया इतना !” चेहरे पर खीज उतर आई थी और आवाज़ में गुस्सा साफ़ झलक रहा था ! थोड़ी देर पहले की व्यवहार की आत्मीयता और वाणी की कोमलता अब तिरोहित हो चुकी थी ! छड़ी से उतारे गए कपड़ों को वह जल्दी-जल्दी करीने से हैंगर में लगाता जा रहा था ! उसके मन का आक्रोश अब जुबाँ से भी फूट रहा था, “इतनी देर मोल भाव किया और कुछ भी नहीं लिया ! किसी दूसरे मोहल्ले में जाता तो अभी तक तो आधे कपड़े बिक गए होते मेरे !” झल्लाते हुए वह आगे को चल दिया ! नूरी भी मन मसोसते हुए अपने घर को चल दी ! 
करीना की आँखों से आँसू बह रहे थे ! अजलू फजलू के चहरे पर संतोष का भाव था और बानो का कलेजा दुःख से फटा जा रहा था ! आँखों के सामने से वो सुन्दर फ्रॉकें हट ही नहीं रही थीं ! अपने ज़रा से शगल के लिए उसने बच्चों का दिल दुखाया इसका भी पछतावा था ! करीना अपने जिस्म पर उन सुनहरी रुपहली नयी-नयी फ्रॉक्स के स्पर्श को याद कर देर तक सुबकती रही ! लेकिन मन में कहीं हल्की सी खुशी भी थी कि नई फ्रॉक न मिली तो न सही इतने अच्छे नए-नए कपड़े कम से कम उसके जिस्म से छुले तो सही वरना तो उसे हमेशा उतरन में मिली औरों की फटी पुरानी घिसी पिटी फ्रॉकें ही अब तक पहनने को मिलती रही हैं जो या तो साइज़ में बहुत बड़ी होती हैं या बहुत छोटी !
साधना वैद

Thursday, June 22, 2017

जीवन की जंग



जीतनी तो थी जीवन की जंग 
तैयारियाँ भी बहुत की थीं इसके लिए 
कितनी तलवारें भांजीं 
कितने हथियारों पर सान चढ़ाई
कितने तीर पैने किये
कितने चाकुओं पर धार लगाई
लेकिन एक दिन सब निष्फल हो गया 
जीवन के इस मुकाम पर आकर 
इतनी ताकत ही कहाँ रही हाथों में
कि कोई भी अस्त्र उठा सकूँ ।
कभी सुना था कि जीवन की जंग 
अस्त्र शस्त्रों से नहीं
खूबसूरत सुरभित फूलों से 
जीती जाती है ।
युद्ध की गगनभेदी रणभेरी से नहीं
सुमधुर स्वर्गिक दिव्य संगीत से
जीती जाती है ।
नहीं जानती इस जंग का 
क्या हश्र होगा लेकिन 
यह तय है कि अब ये हाथ
इतने अशक्त हो उठे हैं कि
इनसे एक फूल भी पकड़ना 
नामुमकिन हो गया है ।
और कानों में दिव्य स्वर्गिक 
जीवन संगीत के स्थान पर 
सिर्फ और सिर्फ तलवारों की 
खनखनाहट ही गूँजती रहती है ।
कोई तो बताये मैं क्या करूँ ।



साधना वैद