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Friday, November 17, 2017

सन्नाटा



दर्पण के सामने खड़ी हूँ
लेकिन नहीं जानती
मुझे अपना ही प्रतिबिम्ब
क्यों नहीं दिखाई देता ,
कितने जाने अनजाने लोगों की
भीड़ है सम्मुख
लेकिन नहीं जानती
वही एक चिर परिचित चेहरा
क्यों नहीं दिखाई देता ,
कितनी सारी आवाजें हरदम
गूँजती हैं इर्द गिर्द
लेकिन नहीं जानती
खामोशी की वही एक
धीमी सी फुसफुसाहट
क्यों नहीं सुनाई देती ,
कितने सारे मंज़र
बिखरे पड़े हैं चारों ओर
लेकिन नहीं जानती
मन की तपन को जो
शांत कर दे वही एक मंज़र
क्यों नहीं दिखाई देता !
नहीं जानती  
यह हमारे ही वजूद के 
मिट जाने की वजह से है
या दुनिया की इस भीड़ में
तुम्हारे खो जाने के कारण
लेकिन यह सच है कि
ना अब दर्पण मुस्कुराता है
कि मन को शक्ति मिले
ना कोई चेहरा स्नेह विगलित  
मुस्कान से आश्वस्त करता है
कि सारी पीड़ा तिरोहित हो जाये ,
ना खामोशी की धीमी-धीमी
आवाजें सुनाई देती हैं
कि हृदय में जलतरंग बज उठे ,
ना आत्मा को तृप्त करने वाला
कोई मंज़र ही दिखाई देता है
कि मन का पतझड़ वसंत बन जाये !
अब सिर्फ सन्नाटा ही सन्नाटा है
भीतर भी और बाहर भी !

साधना वैद

Saturday, November 4, 2017

व्यामोह




यह कैसी नीरसता है
जैसे अब किसी भी बात में
ज़रा सी भी रूचि नहीं रही
पहले छोटी-छोटी चीज़ें भी
कितना खुश कर जाती थीं
मोगरे या सेवंती के फूलों का
छोटा सा गजरा,
काँच के मोतियों की सादी सी माला,
एक मीठा सा गीत,
एक छोटी सी कहानी,
कल कल झर झर बहता झरना,
गगन में उन्मुक्त उमड़ते घुमड़ते
बेफिक्र काले ऊदे बादल,
खूब ऊँचाई पर आसमान में लहराते
दिल के आकार के लाल नीले गुब्बारे,
पेंच लड़ाती रंग बिरंगी पतंगें,
झुण्ड बना कर दूर क्षितिज तक
उड़ान भरते चहचहाते पंछी !
नज़रें इन्हें देखते थकती न थीं
और मन कभी भूले से भी
मुरझाता न था !
अब जैसे सब कुछ
बेमानी सा हो गया है
न कोई भाव जागता है
न कोई खुशी ही मिलती है
ना ही कुछ याद आता है
न ही मन इनमें रमता है !
यह विरक्ति है या व्यामोह
कौन बताये !

साधना वैद



Sunday, October 29, 2017

गुरु - गुरुदेव - गुरुघंटाल



ढोंगी बाबाओं के आश्रमों का मकड़जाल

इस लेख का मकसद उन सच्चे गुरुओं और उनके द्वारा संचालित आश्रमों का अपमान करना बिलकुल नहीं है जो अपनी निस्वार्थ सेवा से जनता का भला कर रहे हैं ! प्रयत्न यह है कि उन कारणों को समझा जाए जिनकी वजह से इतनी बड़ी संख्या में लोग अनेक कपटी बाबाओं के जाल में फँसते चले जाते हैं !

मनुष्य समाज का एक हिस्सा बन कर रहता है ! रोटी, कपड़ा, मकान आदि अपनी बुनियादी आवश्यकताओं के लिए वह कोई न कोई व्यवसाय चुन लेता है ! लेकिन इनके अलावा जीवन में अनेकों ऐसी समस्याएँ या परिस्थितियाँ पैदा हो जाती हैं जिनके समाधान एवं निवारण के लिए उसे किसी के सलाह मशवरे या मार्गदर्शन की आवश्यकता भी होती है जो अक्सर अपने करीबियों या मित्रों से कभी तो मिल जाती है और कभी नहीं भी मिल पाती है ! हम सभी किसी न किसी धर्म का अनुसरण करते हैं ! कुछ नास्तिक भी होते हैं लेकिन उनके बारे में फिर कभी बात करेंगे ! अपने देश में हिन्दुओं का प्रतिशत सबसे अधिक होने की वजह से गुरू भी संख्या में सबसे अधिक हिन्दुओं में ही है !

इन्ही गुरुओं में कुछ तो वास्तव में होते हैं सच्चे महात्मा एवं पथ प्रदर्शक और कुछ के चोले में छिपे रहते हैं गुरु घंटाल ! मनुष्य के रूप में छिपे हुए ऐसे आदमखोर भेड़िये जो अनेक प्रकार के हथकंडों को अपना कर लोगों को अपने जाल में फँसाने में कामयाब हो ही जाते हैं ! दरअसल इस मायाजाल का आरम्भ होता है प्रभावशाली व्यक्तित्व वाले और लुभावनी बातों से लोगों को सम्मोहित कर लेने की क्षमता रखने वाले ढोंगियों की सत्संग सभाओं से जो अक्सर शुरू तो होती हैं किसी पार्क के कोने या छोटे मोटे मंदिर के प्रांगण से लेकिन जब भीड़ बढ़ने लगती है तो इन धर्म सभाओं के लिए बड़े बड़े हॉल या पंडालों की व्यवस्था भी होने लगती है ! उनमें दान पात्र भी आ जाते हैं और धन भी जमा होने लगता है ! एक अच्छे व्यापारी की तरह इस धन का निवेश ये गुरुघंटाल बाबा लोग बड़ी चतुराई से करते हैं ! पहले सत्संग के बाद कुछ प्रसाद, फिर चार छ: महीने में एकाध बार किसी बड़े गुरु के नाम का भंडारा और फिर किसी अच्छी जगह पर, जो अक्सर किसी मंदिर की बगीची इत्यादि होती है, वहाँ पर नियमित भंडारों का आयोजन किया जाने लगता है ! देश की अधिकाँश जनता धर्म भीरू तो है ही साथ ही मनोरंजन की भी भूखी है ! ऊपर से जहाँ मुफ्त में प्रसाद के रूप में स्वादिष्ट भोजन भी मिले तो भक्त लोग तो सपरिवार आते ही हैं अपने मित्रों व सम्बन्धियों को भी साथ में ले आते हैं ! जनता का जमावड़ा बड़ा होता देख पोलीटिकल पार्टियाँ भी बहती गंगा में हाथ धोने के लिए उस गुरु घंटाल में रूचि लेने लगती हैं क्योंकि उनको इसमें अपने वोट बैंक की खुशबू आने लगती है ! नेताओं को देख उनके चमचे, सरकारी अफसर भी हाजिरी लगाने लगते हैं ! पुलिस का आयोजन और सुरक्षा का प्रबंध तो स्वाभाविक रूप से हो ही जाता है क्योंकि आखिर सरकार और पुलिस जनता की सुरक्षा के लिए ही तो बनी हैं ! भंडारे मेले का रूप ले लेते हैं !

अगला कदम है मुफ्त की सरकारी ज़मीन पर कब्ज़ा कर उसको आश्रम या डेरे का नाम दे देना ! इसके लिए सत्ताधारी राजनैतिक दल के नेता और उनके जी हजूरी करने वाले सरकारी अफसर खुद ही इशारा कर ऐसी जगह उपलब्ध करा देते हैं जहाँ पर मनमाना निर्माण कर धीरे धीरे उस आश्रम को एक भव्य रूप देकर गुरुघंटाल खुद उसके राजा बन जाते हैं ! वे मुकुट पहन सिंहासन पर बैठने लगते हैं और अपने लिए निजी सुरक्षा कर्मियों को नियुक्त कर स्वयं ही अपने को विभिन्न विशेषणों और उपाधियों से विभूषित कर एक सिद्ध महात्मा बन जाते हैं ! उनकी महिमा का यश फैलते ही श्रद्धालुओं की संख्या में अपार वृद्धि हो जाती है और आश्रमों की आमदनी बढ़ने लगती है !

दूर से आने वाले भक्तों को आकर्षित करने के लिए आश्रम में ही उनके रहने की व्यवस्था कर दी जाती है ! मनोरंजन के साधन बनाए जाते हैं जो देखने में तो धार्मिक लगते हैं लेकिन होते चकाचौंध वाले हैं ! कुछ ही समय में ये आश्रम पूरी तरह से व्यावसायिक होलीडे होम बन चुके होते हैं ! लाभ की अपार संभावनाएं देख व्यवसायी भी पैसा कमाने के लिए इनसे जुड़ने लगते हैं ! धूर्त ठग भी इस स्थान में अपना अच्छा भविष्य देख चेले बन कर आश्रम के सेवक बन जाते हैं और गुरु के साथ जुड़ जाते हैं ! ये धूर्त लोग गुरु को ठगी के नए-नए तरीके समझाने लगते हैं जो धर्म के नाम पर किये जा सकते हैं ! अब एक ही स्थान पर भोली भाली जनता और विकृत मनोवृत्ति वाले ठगों की सलाह पर चलने वाले गुरुघंटाल का “सत्संग” होने लगता है ! गुरू की कामयाबी को देख चकित जनता उसको भगवान् मानने में देर नहीं करती ! कुछ मूर्ख भक्त तो उसे पूरी तरह से और कुछ कम बुद्धि के लोग आधे मन से उसे ईश्वर के समकक्ष मानने लगते हैं ! कुछ लोग जो ऐसा नहीं मानते वो उस जगह को एक कम खर्च में समय व्यतीत करने का अच्छा मनोरंजक स्थल तो मान ही लेते हैं ! इस भीड़ भाड़ और आपाधापी में कुछ अति दुखी और अनेक कारणों से पीड़ित और टूटे हुए परिवार भी आ फँसते हैं और इन ठगों के जाल में अपने को पूरी तरह से समर्पित कर देते हैं ! आम तौर पर इस भीड़ में अपने हालात और समस्याओं से परेशान और दुखी महिलाओं की संख्या अधिक होती है जो इन गुरुघंटाल बाबाओं के पास उनके निदान के लिए आती हैं ! किसीका पति बीमार है तो किसीकी बेटी का विवाह नहीं हो रहा है, किसीका बेटा बेरोजगार है तो कोई गृह कलह की मारी हुई है, किसीका बच्चा मनोरोगी है तो किसीकी गृहस्थी में पराई स्त्री की दखलन्दाजी है ! गुरुघंटाल ऐसी महिलाओं की मन:स्थिति को ताड़ लेते हैं और फिर उनके समाधान बताने के लिए उन्हें पूरी तरह से अपने चंगुल में फँसा लेते हैं ! तरह तरह के व्रत उपवास, यज्ञ अनुष्ठान करने की सलाहें उन्हें देते हैं और फिर उन्हें निष्पादित करने के उचित एवं प्रभावी तरीके सिखाने के लिए आम सत्संग सभाओं के आगे पीछे अलग समय दे उन्हें बुलाया जाने लगता है ! धन की वर्षा, ऊपर से दूषित मनोवृत्ति के ठगों का प्रभाव और मूर्ख परिवारों का बिना शर्त समर्पण अनैतिकता और अय्याशी की फसल के उगने के लिए एक अच्छी ज़मीन तैयार कर देता है जिसके दुष्परिणामों का अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है और अब तो ये काण्ड सार्वजनिक हो ही गए हैं !

अपने अन्दर झाँक कर यदि हम देखें तो इस दूषित वातावरण को बनाने के लिए क्या हम खुद ही ज़िम्मेदार नहीं हैं ? हम खुद ही इन गुरु घंटालों को निर्मित करते हैं, उन्हें पालते पोसते हैं, उनकी पूजा कर उन्हें ‘भगवान्’ का दर्ज़ा देते हैं, उनकी सुख सुविधा संपन्न एवं ऐश्वर्यपूर्ण जीवन शैली को बनाए रखने के लिए स्वयं कंगाल होते चले जाते हैं लेकिन उफ़ तक नहीं करते और हम में से ही बहुत सारे ऐसे भी हैं जो सब कुछ जानते हुए भी केवल इसीलिये चुप रह जाते हैं कि उन्हें अपनी व अपने परिवार की सुरक्षा के लिए खतरे का आभास होता है क्योंकि ये तथाकथित ‘भग़वान’ यदि कुपित हो जायें तो अपने बागी भक्तों को गाजर मूली की तरह नेस्तनाबूद कर देने में भी पल भर की देर नहीं करते ! एक तरह से समाज के लिए ये सबसे बड़ा खतरा बन जाते हैं ! ये उन अपराधियों से भी अधिक खतरनाक हो जाते हैं जो पुलिस की मोस्ट वांटेड की लिस्ट में होते हैं ! उनके नाम और पहचान तो सार्वजनिक होती है तो स्वयं को पुलिस से बचाने और छुपाने का इंतजाम उन्हें खुद ही करना होता है लेकिन इन तथाकथित ‘भगवान्’ बने अपराधियों को तो पूरा सहयोग समर्थन और संरक्षण हम आप जैसे आम लोग ही दे रहे हैं और वह भी पूरे दम ख़म के साथ ! कोई हाथ लगा कर तो देख ले ‘भगवान्’ को जान देने के लिए हज़ारों की भीड़ खड़ी होती है !

तो मित्रों यही वक्त है अपनी आँखें खोलने का, अपनी अंतरात्मा को जगाने का और अपनी प्राथमिकताओं को तय करने का कि हमें किसका साथ देना है और किसके हाथ मजबूत करने हैं ! सोने के सिंहासनों पर बैठे सात सितारा होटलों से भी अधिक सुख सुविधाओं के साथ ऐश्वर्यपूर्ण जीवन बिताने वाले इन भोग विलासी ‘सन्यासी साधू संतों’ का या इनके हाथों छली जाने वाली और इनकी कुत्सित मनोवृत्तियों का शिकार होने वाली हमारी भोली भाली भक्त बिरादरी का ? निर्णय आपके हाथ में है !


साधना वैद  







Saturday, October 21, 2017

एकाकी मोरनी



बाट निहारूँ 
कब तक अपना 
जीवन वारूँ 

आ जाओ प्रिय 
तुम पर अपना 
सर्वस हारूँ

सूरज डूबा 
दूर क्षितिज तक 
हुआ अंधेरा

घिरी घटाएं 
रिमझिम बरसें 
टूटे जियरा 

कौन मिला है 
कह दो अब नव
जीवन साथी 

हम भी तो थे 
इस धरती पर 
दीपक बाती

कहाँ बसाया 
किस उपवन में 
नया बसेरा 

मुझे बुझा के  
पल पल अपना 
किया सवेरा  


साधना वैद 






Saturday, October 14, 2017

खूँटा



तुमने ही तो कहा था 
कि मुझे खुद को तलाशना होगा 
अपने अन्दर छिपी तमाम अनछुई 
अनगढ़ संभावनाओं को सँवार कर 
स्वयं ही तराशना होगा 
अपना लक्ष्य निर्धारित करना होगा 
और अपनी मंजिल भी 
खुद ही तय करनी होगी 
मंजिल तक पहुँचने के लिए 
अपने मार्ग को भी मुझे स्वयं ही 
सुगम बनाना होगा 
राह के सारे कंकड़ पत्थर चुन कर 
मार्ग को अवरुद्ध करने वाले 
सारे कटीले झाड़ झंखाड़ों को साफ़ कर ! 
मैंने तुम्हारे हर वचन को 
पूरी निष्ठा के साथ शिरोधार्य किया ! 
हर आदेश निर्देश को पूरी ईमानदारी 
और समर्पण भाव से निभाया ! 
देखो ! मेरे पास आओ ! 
मैंने तलाश लिया है खुद को 
सँवार ली है अपने अन्दर छिपी प्रतिभा 
निर्धारित कर लिया है अपना लक्ष्य 
तय कर ली है अपनी मंजिल और 
रास्ता भी सुगम बना लिया है ! 
लेकिन सब उद्दयम व्यर्थ हुआ जाता है
एक कदम भी मैं इस सुन्दर, 
सजे संवरे प्रशस्त मार्ग पर 
बढ़ा नहीं पा रही हूँ !
वर्षों से इसी एक स्थान पर 
रहने के उपरान्त भी अभी तक 
यह नहीं खोज पाई कि 
जिन श्रंखलाओं ने इतनी लम्बी अवधि तक 
मुझे एक कैदी की तरह यहाँ 
निरुद्ध कर रखा है उसका खूँटा 
कहाँ गढ़ा हुआ है 
यहीं कहीं ज़मीन में 
या फिर मेरे मन में !



साधना वैद

Monday, October 9, 2017

कशमकश




महीने के आरम्भ में
चंद रुपये मेरी हथेली पर रख
जिस तरह तुम निश्चिन्त हो जाते हो
मैं थोड़े ही निश्चिन्त हो सकती हूँ
अपनी सौ ज़रूरतें भुला दूँ
पर बाकी सबकी उम्मीदों पर पानी
थोड़े ही फेर सकती हूँ !
उस पर यह आदेश
सोच समझ कर खर्च करना
कम हों या ज्यादह जैसे भी हो
जुगत के साथ पूरा महीना
इन्ही रुपयों में गुज़र करना !
तुम्हें तो बस जुबान हिलानी होती है
अग्नि परीक्षा तो मुझे ही देनी होती है !
घर के हर सदस्य की
तमाम ज़रूरतें, अनगिनत इच्छाएं,
ढेर सारे अरमान, उफनती हसरतें
सब इन थोड़े से रुपयों की
सीमित क्रयशक्ति में कैसे समेट लूँ
सारे परिवार की परवान चढ़ती उमंगों को
इस छोटी सी चादर में कैसे लपेट लूँ !  
इनकी चाहतों के धागे
एक दूसरे के साथ गुथ कर
कितनी बुरी तरह से उलझ गए हैं
कभी जाना है तुमने ?
और उन्हें सुलझाते सुलझाते  
मैं कितना टूट जाती हूँ
कितना बिखर जाती हूँ
यह भी कभी माना है तुमने ?
कितनी अनगिनत गाँठें लग गयी हैं
बेतरतीब उलझे हुए इन धागों में
जो किसी भी तरह खुलती ही नहीं,
कितनी बार इन्हें खोलते खोलते
मेरे नाखून तक टूट गए हैं
लेकिन तमाम कोशिशों के बाद भी  
पहले सी सीधी सपाट हो
   ये कभी जुड़ती ही नहीं !   
कितनी ही बार भारी मन से
कभी-कभी कैंची से भी काटनी
पड़ जाती हैं ये गाँठें
लेकिन ये कोई साधारण ऊन या
धागों की गाँठें नहीं हैं
उन्हें काट दो तो दर्द नहीं होता
इन्हें काट दूँ तो कई आँखों में
बिजली कौंध जाती है
जो मेरा सुख चैन जला कर
पल भर में राख कर जाती है,   
कई आँखों में घटाएं उमड़ आती हैं
जो मेरी आँखों से रक्तधारा बन
रिमझिम बरसने लगती हैं !
थक गयी हूँ बहुत अब
या तो यह चादर बड़ी हो जाए
या फिर ज़रूरतों के ये धागे
इतने चिकने और मुलायम हो जाएँ
कि इनमें कभी गाँठें लगे ही ना !
बस जीवन में खुशियाँ ही खुशियाँ हों 
ना तो कभी आवेश की बिजली कौंधे
ना कभी सुर्ख रक्त की
जलधार ही बहे !

साधना वैद
 

Thursday, October 5, 2017

थकन



बहुत थक गयी हूँ
मेरे जीवन साथी !
जीवन के इस जूए में
जिस दिन से मुझे जोता गया है
एक पल के लिए भी
गर्दन बाहर निकाल लेने का
मौक़ा ही कहाँ मिला है मुझे !
चलती जा रही हूँ  
चलती जा रही हूँ
बस चलती ही जा रही हूँ
निरंतर, अहर्निश, अनवरत !
कन्धों पर गृहस्थी का जो बोझ
तुमने डाल दिया है उसे तो
जीवन की अंतिम साँस तक
ढोना ही होगा मुझे !
आरम्भ में चाल में जोश था,
उत्साह था, चुनौती थी,
गति थी, संकल्प था, दृढ़ता थी !
लेकिन अब चाल थमने लगी है
पैर थक कर चूर हो गए हैं
जोश, उत्साह, गति सब
तिरोहित हो चुके हैं !
बस अब चल रही हूँ
क्योंकि चलते रहना
एक आदत सी बन गयी है
सो चले जा रही हूँ
चलती ही जा रही हूँ
लेकिन उम्र के इस मुकाम पर
कुछ विश्राम चाहती हूँ
कुछ देर आँखों को मूँद
ग़हरी नींद में सोना चाहती हूँ
क्योंकि पूरी तरह से चूर होकर
तन और मन दोनों ही
इतने निढाल हो चुके हैं कि
अब जीना भी बेमानी सा
लगने लगा है और चलना भी
नितांत असंभव हो गया है !


चित्र - गूगल से साभार 


साधना वैद 

Sunday, October 1, 2017

अब तो मुझे सोने दो




दीवार पर टंगी
बापू की तस्वीर उदास है
स्वर रुंधे हैं, आँखें बे आस हैं
कल जन्मदिन जो आ रहा है
लोगों की बनावटी, झूठी, असहनीय,
खोखली बातों को सुनने का, झेलने का
झेल कर असहज होने का
वही मनहूस दिन कल
फिर से जो आ रहा है !
बापू के मन में
विचारों का तूफ़ान
तेज़ रफ़्तार से चलता रहा  
लुटा दिया सर्वस्व जिन पर
ताउम्र उन्हीं की आँखों में
मैं किरकिरी की तरह
खटकता रहा !
सारे सुख, सारे वैभव त्याग
एक धोती में मैंने अपना  
सारा जीवन काट दिया
लेकिन उनके ऐशो आराम में
कहीं मैं रुकावट न बन जाउँ
इस डर से मेरे साथियों ने मुझसे ही
अपना रास्ता काट लिया !
मेरी बातों से, मेरी नीतियों से  
विदेशी हुक्मरानों की सोच बदली
देश की सूरते हाल बदली
और देश आज़ाद हुआ  
लेकिन मेरी हर सोच, हर बात,
हर सलाह मेरे ही देशवासियों को
नागवार गुज़री और कुछ
असामाजिक तत्वों के बरगलाने से
देश साम्प्रदायिक ताकतों का
गुलाम हुआ !
मेरी सलाह, मेरे मशवरे,
मेरे भाषण, मेरे तस्किरे,
मेरे व्रत, मेरे उपवास
किसी काम न आये,
देश में दंगे हुए, फूट पड़ गयी
बँटवारा हो गया
जनता गाजर मूली की तरह
कटती रही उसे बचाने
ना तो रहीम आये और
ना ही राम आये !
सारी हिंसा का ठीकरा
मेरे सिर फोड़ दिया गया
और मेरी सारी सद्भावनाओं
सारी हित चिंताओं को
परे सरका मुझे गोलियों से
भून दिया गया !
मुझे यूँ नींद में सुलाने के बाद
अब किसलिए यह
ढोंग और दिखावा,
सहा नहीं जाता मुझसे
अपनों के ही हाथों मिला
यह विश्वासघात और छलावा !
बंद करो श्रद्धा और भक्ति का
यह झूठा अभिनय,
यह देशप्रेम और नैतिकता की बातें
जो हो रहा है वह होने दो,
मत डालो मेरी अंतरात्मा पर
राष्ट्रपिता होने के दायित्व का
और गुरुतर बोझ  
मैं थक गया हूँ बहुत
अब तो मुझे चैन से सोने दो !

साधना वैद
  



Thursday, September 28, 2017

अधिक उत्पादन – जी का जंजाल – क्या करे किसान



अर्थ शास्त्र का सिद्धांत है कि यदि किसी वस्तु का उत्पादन माँग से अधिक होने लगता है तो उसकी कीमत गिर जाती है और उत्पादक को हानि होने लगती है ! अधिक उत्पादन की मार का असर अनेक वस्तुओं पर समय-समय पर दिखाई देता रहता है ! कभी गन्ने की फसल खेत में ही इसीलिए जला दी जाती है कि खेत में उनकी कटाई तक का मूल्य बिक्री करने पर नहीं निकल पाता है ! कभी प्याज़ लहसन की कीमत इतनी गिर जाती है कि किसान उन्हें सड़क पर फेंक देना ही उचित समझते हैं ! आगरा के क्षेत्र में आलू के किसान इस वर्ष इसी समस्या को झेल रहे हैं ! आइये आलू की इस दुर्दशा का कुछ अध्ययन करें !

कई वर्ष पहले देश की आलू की पैदावार आवश्यकता से कम थी ! आलू उत्पादकों को लागत का पाँच से सात गुना तक मूल्य मिल रहा था ! आगरा का आलू गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, बिहार आदि प्रान्तों में हाथों हाथ बिक रहा था ! रातों रात सब किसान जो पहले सरसों, बाजरा, दलहन और गेहूँ की खेती करते थे आलू उत्पादक बन गए ! पूँजीपतियों ने भी इस क्षेत्र में कोल्ड स्टोरेज की कतार लगा दी और लाभ की बहती गंगा में हाथ धोने लगे जो स्वाभाविक भी है पर जिन राज्यों में आगरे का आलू मँहगा बिक रहा था वहाँ के किसान भी आखिर कुछ तो सोच विचार करते ही हैं ! उन्होंने भी अपने क्षेत्रों में प्रयोग के लिए आलू उगाये और आज स्थिति यह है कि आज से लगभग १७५ वर्ष पूर्व जो आलू के बीज अंग्रेजों द्वारा बाहर से लाकर ठन्डे पहाड़ी क्षेत्र में बोये गए और यह मान लिया गया कि यही ठंडा क्षेत्र इस की फसल के लिए उपयुक्त है उसके नए बीजों के कमाल से और भारतीय किसानों की अथक मेहनत से आलू अब पंजाब से लेकर बंगाल तक और हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक हर तरह की जलवायु और मिट्टी में बोया जा रहा है और उसकी भरपूर फसल भी मिल रही है ! खुशी की बात है ना ? लेकिन वास्तव में यह बात खुशी की नहीं वरन दुःख की है क्योंकि अधिक उत्पादन की वजह से आलू की फसल की कीमत लगातार घट रही है और किसान बड़े घाटे में जा रहा है !

आखिर गेहूँ की उपज करने वाला किसान गेहूँ को छोड़ आलू के उत्पादन में क्यों लग गया ? कारण वही है गेहूँ का आवश्यकता से कहीं अधिक उत्पादन ! जो लोग ट्रेन या सड़क मार्ग से उत्तरी भारत की यात्रा करते रहते हैं उन्होंने खुले आसमान के नीचे मात्र जर्जर त्रिपाल से ढके जगह-जगह खेतों में पड़े हुए गेहूँ के बोरों के पहाड़ अवश्य देखे होंगे ! यह वह समय था जब सरकार समर्थन मूल्य पर किसानों का सारा गेहूँ खरीद लेती थी जो उस वक्त की स्थिति के अनुरूप किसान के लिए बहुत सुविधाजनक था ! किसान आलू दलहन और तिलहन को छोड़ तब गेहूँ उत्पादन में लग गए ! अधिक उत्पादन से खुले बाज़ार में गेहूँ की कीमत गिरने लगी लेकिन सरकारी समर्थन मूल्य के सहारे किसान का काम चलता रहा और अनावश्यक गेहूँ खुले में जमा होता रहा, फिर सड़ता रहा और फेंका जाता रहा ! पर सरकार के पास तो टैक्स का पैसा होता है वह घाटा झेलती रही पर समर्थन मूल्य भी घटाती रही ! आज गेहूँ का समर्थन मूल्य बाज़ार भाव से भी कम हो चुका है इसलिए सरकारी खरीद ना के बराबर हो चुकी है और पंजाब जैसे गेहूँ के क्षेत्र वाले किसान भी अब चावल और आलू की तरफ उन्मुख हो चुके हैं ! पर इस आपाधापी में पहले दलहन का क्षेत्र कम हुआ और दालों की कीमत आसमान पर जा पहुँची ! अब जाकर किसानों ने जब दलहन का उत्पादन बढ़ाया और आयात का भी सहारा मिला तब दालों की कीमत में कुछ कमी आई है ! आज स्थिति यह है कि हमारा गेहूँ का, चावल का, आलू का उत्पादन देश की आवश्यकता से कहीं ज्यादह है ! 

हम इस वास्तविकता को मानने को अभी तैयार नहीं हैं कि हमारे देश की कुल कृषि योग्य भूमि और उस पर काम करने वाली मानव शक्ति ( मैन पावर ) उस उत्पादन में लगी है जिसकी पूरी खपत अपने देश में नहीं है ! चावल और गेहूँ भारत को मजबूरी में लागत से कम कीमत पर निर्यात करना पड़ रहा है ! कुछ लोग कहेंगे कि सरकार इस अतिरिक्त उत्पाद को अति निर्धन लोगों को मुफ्त में क्यों नहीं बाँट देती ! बाँटने के लिए जितने साधन चाहिए उनकी देश में भारी कमी है !

ऐसे ईमानदार अधिकारी और नेता जो सही पात्र को पहचान सकें और इस सहायता को अपात्रों तक पहुँचने से रोक सकें !

जागरूक और इमानदार मीडिया जो अति निर्धन लोगों को इस सुविधा की सूचना दे सके और उनको इस पाइप लाइन के उस सिरे तक पहुँचा सके जहाँ यह मुफ्त बँट रहा हो !

ऐसा ईमानदार और प्रभावी पुलिस बल जो उन पाइप लाइनों की चोरी और लूटमारी से रक्षा कर सके जिनके माध्यम से यह सुविधा प्रदान की जा रही है !

ज़रा सोचिये क्या यह संभव है और इसकी लागत क्या आयेगी ? इसको चोरों और जमाखोरों से कैसे बचाया जाएगा जो पहले से ही इन धंधों के कारण मालामाल हो रहे हैं अर्थात फ्री में बाँटना न तो संभव है ना ही इस समस्या का पूरा हल है ! फिर फ्री बाँटने से तो बाज़ार की कीमतें और गिरेंगी और हमारा ‘अन्नदाता’ किसान और मुसीबत में आ जाएगा !

इस समस्या के हल के लिए सबसे पहले हमको अपनी इस सोच को बदलना पड़ेगा कि भारत में खेती करना ही सबसे उत्तम व्यवसाय है और ग़रीब सा दिखने वाला एवं अनेक साधनों से वंचित यह ‘अन्नदाता’ किसान देश की शान है जो बहादुर सिपाहियों की तरह सीमा पर गोली न खाते हुए भी अपनी जान कभी बीमारी से, कभी भुखमरी से और कभी चरम हताशा के कारण आत्महत्या करके दे देता है ! उसे बताया जाता है कि यह धरती तुम्हारी माँ है और यदि तुम इससे दूर हो गए तो आने वाली तुम्हारी पीढ़ियाँ भूमिहीन हो जायेंगी और फिर उनका कोई भविष्य नहीं रहेगा ! लगे रहो इसी भूमि पर ! बने रहो ग़रीब ! मरते हो तो मरते रहो पर तुम्हारा व्यवसाय तो गौरवशाली है ! लोग तो तुम्हें ‘अन्नदाता’ मानते हैं ! तुम ज़मींदार हो ! ज़रा कल्पना कीजिये फटे हाल क़र्ज़ में डूबे, हताशा के मारे इन ‘अन्नदाता ज़मीदारों’ की कैसी अद्भुत वंशावली चली आ रही है जो मुंशी प्रेमचंद के ज़माने से अभी तक उसी हाल में जीने के लिए मजबूर हैं !

पश्चिम बंगाल में जब वामपंथी सरकार थी तब उनके एक समझदार मुख्यमंत्री ने इस समस्या को समझा और किसानों को अधिक चावल के उत्पादन से रोकने के लिए उन्हें अपनी कुछ ज़मीन को बड़े उद्योगों के लिए बेच कर अपनी ग़रीबी दूर करने और जीवन यापन के नए तरीके अपनाने के लिए मनाया ! लेकिन मने मनाये किसानों को जब यह बताया गया कि ऐसे तो तुम ‘अन्नदाता ज़मींदार’ से कारखाने के मजदूर बन जाओगे तो वे भड़क उठे और एक बहुत बड़े उद्योगपति को अपना कारखाना लगाने के लिए बंगाल को छोड़ गुजरात जाना पड़ा !

आज वही किसान अपनी ग़रीबी लिए और समझाने वालों के द्वारा पहनाये गए सूखे हार पहने हुए सोच में डूबा खड़ा है कि मेरे लिए क्या ठीक था और क्या ग़लत ! खैर आइये फिर आलू की फसल पर आते हैं !

ज़रुरत से ज्यादह आलू उत्पादन के क्षेत्र में कमी करनी होगी !
अदल बदल कर कभी तिलहन कभी दलहन और कभी गेहूँ और कभी आलू की खेती करनी होगी जिसके लिए उन्हें उचित समय पर बाज़ार की सही जानकारी उपलब्ध करानी होगी !

यह पुराने अनुभवी सभी किसान जानते हैं कि बदल-बदल कर अलग फसल बोने से भूमि की उर्वराशक्ति तो बढ़ती ही है खाद आदि के खर्च में भी कमी आती है !

किसानों की कुछ भूमि को ऐसे उद्योग में लगाने के लिए उपयोग में लाना होगा जिससे उस क्षेत्र के लोगों को रोज़गार मिल सके !

आज का किसान विशेष रूप से आलू बोने वाला किसान अपने खेत पर केवल पार्ट टाइम कर्मचारी बन कर काम करता है ! अपने खाली समय को वह दो तरह से खर्च करता है ! समझदार लोग तो आस पास के शहरों के कारखानों में काम कर अपनी आमदनी बढ़ा लेते हैं लेकिन नादान किसान शराब, जूए और व्यर्थ के झगड़ों और मुकदमेबाजी में समय खपा देते हैं ! यह समझ में आ जाना चाहिए कि आवश्यकता से अधिक उत्पादन दुखदायी ही होता है ! ज़रा सोच कर देखिये क्या यही स्थिति इन दिनों आई टी क्षेत्र के एक्सपर्ट्स की नहीं हो रही है ? क्या अधिक उत्पादन की मार वे नहीं झेल रहे हैं ! यह भी एक विचारणीय विषय है लेकिन इसकी चर्चा फिर कभी सही !



साधना वैद  


Wednesday, September 27, 2017

मैं ग़रीब हो गया



मेरे मौला
तूने तो मालामाल किया था मुझे
प्यार की दौलत से
मोहब्बत की दौलत से
इल्म और इखलाक की दौलत से
इंसानियत की दौलत से  
मैंने ही कभी कद्र न की उसकी
मुफ्त जो मिल गयी थी
भागता रहा काग़ज़ की दौलत के पीछे
सिक्कों की खनखनाहट के पीछे
कितने जतन किये उसे पाने के लिए
कितनी कड़ी मेहनत की
कितने सारे इम्तहान दिए
मेहनत रंग लाई तो
कुछ कमाया भी ज़रूर
लेकिन इस कमाई की जद्दोजहद में
बहुत कुछ गँवा भी दिया
वह अनमोल दौलत जिससे तूने मुझे
भर हाथों नवाज़ा था
मेरे हाथ से फिसल गयी !
इंसानियत की दौलत
स्नेह और सौहार्द्र की दौलत
प्रेम और संवेदनशीलता की दौलत
मानवीयता की दौलत  
और मैं बन गया 
एक खुरदुरा इंसान
नितांत स्वार्थी, संकीर्ण, 
आत्म केन्द्रित और अहंकारी इंसान
जिसे सिर्फ खुद से प्यार करना आया
जिसका दिल जिसकी आत्मा
कभी किसीके भी दुःख से
ज़रा भी नहीं पसीजते  
कड़वे शब्द जिसके मुख से
झरने की तरह बहते हैं
मैं बन कर रह गया
सिर्फ और सिर्फ 
एक खोखला इंसान
जिसका कोई मोल नहीं
कोई इज्ज़त नहीं
और इतने बड़े संसार में
शायद जिसकी 
    कोई ज़रुरत भी नहीं !    
मेरे मौला
मैं ग़रीब हो गया !


साधना वैद