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Thursday, July 20, 2017

सुबह हुई





सुबह हुई 
हमसफ़र चाँद 
घर को चला


देखो तो ज़रा 
क्षितिज के किनारे 
कौन है आया


दानी आदित्य 
लुटा रहा प्रकाश 
सहस्त्र हाथों


रवि रश्मियाँ 
सहलाएं तन को 
पुलकी धरा


दिव्य रश्मियाँ 
उतरीं धरा पर 
साक्षी हैं वृक्ष


स्वागत करे 
भुवन भास्कर का 
मुग्ध वसुधा


मौन पर्वत 
झर झर झरने 
करे नमन


पग पखारें 
कल कल नदियाँ 
मुदित मन


करे प्रकृति 
सुन्दर सुवासित 
पुष्प अर्पित


लदे हुए हैं 
फलों से तरुवर 
भोग के लिए


मुखर हुई 
विहगों के गान में 
ईश वन्दना


नत मस्तक 
झुकी अभ्यर्थना में 
धरा सुन्दरी


आँखें तो खोलो 
धन्य करो नयन 
दिव्य दृश्य से


जागी संसृति 
मन में आस लिए 
भोर हो गयी



साधना वैद